उषा जी सड़क पर चली जा रही थी एक कार ने बिल्कुल उनके करीब ब्रेक लगाए, हड़बड़ाहट में वे गिर पड़ीं!! गाड़ीवाला नीचे उतरा और उषा जी को सहारा देकर उठाया, "आँटी आपको चोट तो नहीं लगी, आप ठीक हैं??"
उषा जी ने हाँ में सिर हिलाया!!
गाड़ीवाला: आप कहाँ जाएंगी, बताइए मैं आपको छोड़ दूँगा??
जवाब में उषा जी के आंसू बहने लगे वे कुछ न
बोल पाईं!!
गाड़ीवाला: "अरे! आप रोइए मत, आइए मेरे साथ।"
गाड़ीवाले ने उषा जी को सहारा दिया और अपनी कार में बिठाया, फिर पानी पिलाया, "आप कुछ खाएंगी??"
उषा जी ने ना में सिर हिला दिया!!
गाड़ीवाला: देखिए आंटी जी मेरा नाम सुमित है, मैं आपके बेटे जैसा हूँ, आपकी कोई समस्या है तो मुझे बताइए??
उषा जी कुछ न बोली, अपने आंसू पौंछती रहीं!!
सुमित: "आंटी एक काम करते हैं आप मेरे घर चलिए, वहाँ आराम से बात करेंगे।" (कहते हुए सुमित ने कार अपने घर की तरफ मोड़ ली)
घर के बाहर कार रोककर उषा जी को सहारा देते हुए वह घर के अंदर ले आया और खाने की मेज पर बिठा दिया!
अपनी माँ को आवाज दी, "माँ ये आंटी बहुत परेशान है, मुझे तो कुछ नहीं बताया, जरा आप इनसे बात कीजिए!!"
सुमित की माँ रेखा ने उषा जी के कंधे पर हाथ रखा, तो आंसू भरी आँखों से उषा जी उनकी तरफ देखने लगी।
रेखा ने नौकरानी से खाना लगाने को कहा।
रेखा: "आप परेशान मत होइए, निश्चिंत होकर खाना खाइए!"
बार-बार आग्रह करने पर उषा जी ने खाना शुरू किया।
उषा जी भूखी थीं उन्होंने शांति से खाना खाया!!
तब तक सुमित के पिता रमाकांत जी आ गए।।
सुमित की मां ने उषा जी के बारे में बताया!!
रमाकांत: "जब आपका मन करे तब अपनी परेशानी मुझे देना मैं आपकी हर संभव मदद करूँगा!!"
उषा जी को ताज्जुब हो रहा था कि ऐसे लोग भी हैं दुनिया में!!
वह बोली, "मेरी समस्या का कोई हल नहीं, मेरा परिवार ही मेरे दुख का कारण है!!
रमाकांत: अरे! "आप बताइए तो सही, समस्या निपटाना ही तो हमारा काम है!!"
उषा जी ने रोते-रोते अपनी आपबीती रमाकांत के समक्ष सुनाना शुरू किया!!
6 माह पहले मेरे पति की मौत हुई है, तभी से मेरे बुरे दिनों की शुरुआत हुई!!
मैं अपने पति की मौत को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मेरे पति हृदय गति रुक जाने से भगवान को प्यारे हो गए, लेकिन मैं अपने पति की यादों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहीं थी।
घर में अन्य सदस्य भी थे इकलौता बेटा कबीर, बहू कविता और 6 वर्षीय पोती।
पति को मरे 20 दिन ही हुए थे कि बहू ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। बहू को आते देखकर मैं अपने आँसू छिपाने लगी!!
बहू: मांजी कब तक रोती रहेंगीं, ससुर जी आपके आँसू पौंछने नहीं आयेंगे, खुद को संभालने और घर के काम-धाम में मन लगाइए, बैठै-बैठे शरीर बेकार हो जाएगा कौन ले जाएगा आपको बार-बार डाॅक्टर के पास??
उषा जी कुछ न बोली!!
थोड़ी देर बाद बहू फिर आई, फिरसे अपनी बात दोहराई।
उषा जी ने अनसुनी कर दी, बहू उन्हें घसीटती हुई रसोई में ले गई, खाना बना लीजिए बाद में रोती रहना!!
उषा जी खाना बनाने लगीं। वे घर के कामों में स्वयं को व्यस्त रखने लगीं।
सुबह से शाम तक काम में व्यस्त रहती और बहू के हुक्म की तामील करती रहती। शाम तक बुरी तरह थक जातीं।
एक दिन कबीर से बोली, "बेटा एक काम वाली रख ले, मैं बहुत थक जाती हूँ!!"
कबीर: माँ आप दोनों हैं घर में, काम ही कितना है??
कविता बीच में बोल पड़ी, "मैं तो माँ जी से कोई भी काम न कराऊँ, लेकिन पड़े-पड़े शरीर खराब हो जाएगा, हमें ही बार-बार डाॅक्टर के पास लेकर भागना पड़ेगा, इसलिए माँजी थोड़े हाथ-पैर हिलाना अच्छी बात है!!"
कबीर: "कविता सही कह रही है माँ, आपका कितना ख्याल रखती है, हर वक्त माँ-माँ करती हुई आपके पीछे भागती रहती है।"
उषा जी चुप हो गईं, बेटा बहू की हाँ में हाँ मिला रहा था, अपनी पीड़ा किसको दिखाएं??
उषा जी खामोश हो गईं। किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं, मन ही मन, घुटती रहती!!
6 माह बीत गए। एक दिन उनकी तबियत खराब हो गई, किसी तरह रसोई का काम खत्म करके अपने कमरे में आकर बिस्तर पर पड़ गई, बुखार से बदन तप रहा था आँख बन्द होने लगी थी कि बहू की आवाज सुनाई दी, "अरे! माँजी, चाय बना दीजिए, मेरी सहेली आई है, कितना सोती हैं आप??
उषा जी उठीं धीरे-धीरे चलकर रसोई में पहुंची, उन्होंने चाय बनाई, कांपते हुए कमरे में लेकर आई,
बहू की सहेली को चाय देते वक्त हाथ कांपे और चाय उसकी साड़ी पर गिर गई!!
सहेली गुस्से से तमतमा कर खड़ी हुई, "ए बुढ़िया हाथों में जान नहीं है क्या??" (कहते हुए जोरदार धक्का दे दिया)
उषा जी दरवाजे के पास जाकर गिरी, वह उठने का प्रयास कर ही रही थी कि कविता तो जैसे मौके की तलाश में थी, उषा जी को घसीटते हुए ले गई और बाहर धकेल दिया, "निकल बुढ़िया तू किसी काम की नहीं, मर जा कहीं जाकर, दुबारा घर के अंदर मत आ जाना!!"
उषा जी घर के बाहर कब तक पड़ी रही, उन्हें नहीं पता?? बेटे के स्पर्श से उन्हें होश आया!!
कबीर: "माँ बाहर क्या कर रही हो, तुम्हें तो तेज बुखार है??"
उषा जी: "कविता ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया है, कहा कि कहीं जाकर मर जा।"
कविता: माँजी आप तो दवा लेने गई थीं, आपका बुखार इतना कैसे बढ़ गया, आपने दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया, आप ये क्या अनाप-शनाप बक रही हैं, मैं तो आपका कबसे इंतजार कर रही थी कि आप कहाँ रह गईं?? मैंने आपसे साथ चलने को कहा था आपने मना कर दिया!!"
कबीर: अरे! "ज्यादा बुखार है इसलिए अर्रक-जर्री दे रही हैं!!"
कबीर ने उषा जी को बिस्तर पर लिटाया और दवाई दी। कविता को हिदायत दी कि वह माँ को कल डाॅक्टर के पास ले जाए!!
कबीर के जाते ही कविता उषा जी से बोली, "जाओ यहाँ से किसी वृद्धाश्रम मे जाकर डेरा जमा लो, ताकि हम चैन से रह पाएं, मैं नहीं चाहती कि तुम्हें कल की तरह धक्के देकर निकालूँ??"
उषा जी चुपचाप उठीं अपनी छड़ी उठाई और घर से बाहर निकल गईं, सोचती जा रही थी कि ऐसी जिल्लत से क्या फायदा, किसी गाड़ी के नीचे आकर अपनी जान क्यों न देदूं?? ये सोचकर सड़क के बीचोंबीच चलने लगी!!
इतना कहकर उषा जी चुप हो गई।
रमाकांत: "मैं आपकी बात समझ गया, अब आप क्या चाहती हैं??"
उषा जी प्रश्न भरी निगाहों से रमाकांत जी को देखने लगी!!
रमाकांत: "देखिए अगर आप बेटे-बहू के साथ रहना चाहती हैं तो बताइए, घर बेचना चाहती हैं तो बताइए या बेटे-बहू से घर खाली करा कर उसमें रहना चाहती हैं तो बताइए। जो आप चाहेंगी वही होगा??"
उषा: "मैं बहू-बेटे के साथ तो बिल्कुल नहीं रहना चाहती क्योंकि बहू मजबूरी में सुधरने का ढोंग करेगी सुधरेगी नहीं, इसलिए मुझे दिक्कत होगी।
मैं घर बेचना भी नहीं चाहती क्योंकि मैं अपने घर में पति की यादों के साथ रहना चाहती हूँ!!"
रमाकांत: "ठीक है! हम कल ही आपके घर चलते हैं और 10 दिन का समय देकर घर खाली कराते हैं
लेकिन आप बेटे को देख कर कमजोर मत पड़ जाना!!"
उषा: नहीं! नहीं! ऐसा नहीं होगा!
अगले दिन सुबह 9 बजे के लगभग उषा जी के घर के सामने कार रुकी जिसमें से रमाकांत, सुमित और उषा जी बाहर निकले और घर के अंदर प्रवेश किया!
माँ को देखते ही कबीर बोला, "अरे! माँ कहाँ थी आप, हाॅस्पीटल से कहाँ चली गईं थीं?? मैं कितना परेशान हूँ, कल से आपको ढूंढ़ रहा हूँ!!
कबीर की बात सुनकर उषा जी उसका मुँह ताकने लगीं!!
कबीर: बोलो न माँ! "कल आप कविता के साथ अस्पताल गईं, फिर आप कहाँ चली गईं?? कविता शाम तक आपको ढूँढ़ती रही!!"
"मैं घर आया तो मुझे पता चला कि आप अस्पताल से चुपके से कहीं चली गई, तब से मैं आपको ढूंढ़ रहा हूँ, कुछ बताओ माँ??
लेकिन उषा जी कुछ न बोली!!
रमाकांत: "देखिए मि. कबीर मैं उषा जी का वकील हूँ, आप ये घर 10 दिन के अंदर खाली कर दें उषा जी आप लोगों को अपने साथ नहीं रखना चाहती।"
इतना सुनते ही कविता के पैरों तले जमीन खिसक गई, वह एकदम बोली, "ऐसा कैसे ये हमारा घर है,
ससुर जी का बनवाया हुआ, हम यहाँ से क्यों जाएं??"
रमाकांत: "क्योंकि उषा जी ऐसा चाहती हैं!! ये घर उनके नाम पर है, अगर उनके पति के नाम पर होता तो भी मर्जी की मालिक उषा जी ही होती! आप तो ये बताइए कि 10 दिन में घर खाली हो जाएगा या नहीं??"
कविता: ऐसे कैसे हो जाएगा, हम कहीं नहीं जाएंगे! माँजी आप ये कैसे कर सकती हैं?? कोई गलती हुई है तो मैं आपसे माफी मांगता हूँ!
रमाकांत: ठीक है कल मैं कोर्ट का आदेश...
कबीर जो परिस्थिति को समझने का प्रयास कर रहा था बीच में ही बोला, "नहीं वकील साहब मैं 10 दिन में घर खाली कर दूंगा कोर्ट के आदेश की जरूरत नहीं है, लेकिन मैं इस सबकी वजह जानना चाहता हूँ कि आखिर मेरी माँ को इतना बड़ा कदम क्यों उठाना पड़ रहा है??"
उषा जी की तरफ देखते हुए, "बताइए न माँ क्या बात है??"
उषा जी कुछ न बोली!!
कविता: उषा जी के पैर पकड़कर माफी मांगते हुए, "माँजी मुझे माफ कर दीजिए!!"
उषा जी ने अपने पैर पीछे खींच लिए!!
रमाकांत: "चलिए उषा जी!!"
कबीर: "माँ मैं 10 दिन में घर खाली कर दूंगा लेकिन ये 10 दिन तो आप मेरे साथ रहिए!!"
उषा जी बिना कुछ कहे कार की ओर मुड़ गई!!
उनके जाते ही कबीर धम्म से सोफे पर बैठ गया जैसे शरीर से जान निकल गई हो!! न खाना खाया न ही ऑफिस गया। सोफे पर ही पड़ा रहा। कविता ने कई बार खाना खिलाने का प्रयास किया। भूख नहीं है कहकर मना कर दिया।
कविता मन ही मन पछता रही थी उसने तो सोचा ही नहीं कि अनपढ़ गंवार बुढ़िया वकील के भी पास जा सकती है??
कबीर उठा और सीधे रमाकांत जी के घर जा पहुंचा, देखते ही माँ से लिपट गया दोनों माँ-बेटे फूट-फूट कर रोए। बेटे ने माँ से साथ न रहने की वजह पूछी!!
उषा जी चुप रहीं वह नहीं चाहती थीं कि बेटा-बहू के बीच दरार पैदा हो!!
लेकिन रेखा और सुमित ने उषा जी का कहा हुआ एक-एक शब्द कबीर को बता दिया। बहुत शर्मिंदा
हुआ, "इतना कुछ हो गया माँ आपने बताया क्यों नहीं??"
उषा: "बताया था बेटा!! जब मैं दरवाजे के बाहर पड़ी थी" "कविता ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया है, तुझे लगा कि मैं बुखार की वजह से अनाप-शनाप बक रही हूँ!!"
कबीर को माँ की कही एक-एक बात याद आ गई, मैं ही कितना पागल था कुछ समझ ही न पाया!!
उषा: "जो भी हो बेटा तू कविता से कुछ मत कहना मैं नहीं चाहती कि तुम दोनों के बीच कोई खटास आए!!"
कबीर: माँ आपका दिल बहुत बड़ा है, अब भी उसी के बारे में सोच रही हैं!!
कबीर घर चला गया। रोजाना माँ से मिलने आता रहा। 10 दिन के अंदर ही उसने किराए का घर लेकर माँ का घर खाली कर दिया।
कविता उसे लगातार कहती रही कि माँ कहाँ हैं पता करके उन्हें किसी भी तरह मनाने की कोशिश करो हम कहाँ जाएंगे, कैसे रहेंगे किराए के मकान में??
10 दिन बाद उषा जी ने सुमित और कबीर के साथ अपने घर में प्रवेश किया!
कबीर ने माँ की देखभाल और घर के कामकाज के लिए एक प्रौढ़ महिला की व्यवस्था कर दी।
रोजाना ऑफिस से सीधा माँ के पास आता आधा घण्टा रुकता फिर अपने घर चला जाता!!
उषा जी भी खुश रहती, काम वाली पूरे दिन उनके पास रहती शाम को अपने घर चली जाती!!
कविता बार-बार पूछती, "माँजी अपने घर रहने आ गई क्या??"
कबीर का जवाब होता, " मुझे नहीं मालूम!"
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)