Monday, 27 February 2023

गुदगुदी

1- कविता 10वीं कक्षा की छात्रा थी। उसकी एक सहेली जिसका नाम सुनयना था। गणित-विज्ञान के एक अध्यापक ट्रांसफर होकर आए नाम था गौरीशंकर। वे सुनयना का नाम सुनिएना-सुनिएना कहकर पुकारते थे। सभी सहेलियां ठहाके लगाकर
हंसती। सुनिएना-सुनिएना कहकर सुनयना को चिढ़ाती!!!
😀😀😀😀😀

2- कक्षा अध्यापिका ने छात्रा की बहती नाक देखकर छात्रा से कहा, "जा नाक साफ करके आ।"
छात्रा भागती हुई अपने घर पहुँची।
घर जाकर अपनी माँ से कहा, "मैडम ने कहा है, "जा नाश्ता कर आ।" "मेरे लिए समोसे मंगा दो मैं नाश्ता करके जाऊंगी।"
उसकी माँ बच्ची को घसीटती हुई विद्यालय लेकर आई। अध्यापिका से बोली, "मैंने इसे खाना खिला कर पढ़ने भेजा था और तुमने इसे नाश्ता करने के लिए वापस घर भेज दिया।"
अध्यापिका ने कहा, "मैंने इसे घर कब भेजा, मैंने तो इसे नाक साफ करने के लिए कहा था, ये घर भाग गई नाश्ता करने।" 
छात्रा की माँ की गलतफहमी दूर हुई। वह हँसते हुए घर लौट गई!!!
😀😀😀😀😀

3- प्रधानाध्यापिका ने विज्ञान की अध्यापिका को वार्षिक उत्सव के लिए एक नाटक तैयार कराने का कार्य सौंपा। अध्यापिका ने एक नुक्कड़ नाटक छात्रों को तैयार करा दिया। प्रधानाध्यापिका तैयार कराए गए नाटक का जायजा लेने लगी।
नाटक में एक पंक्ति कही गई, "जगह-जगह नज़मा लगा हुआ है।" प्रधानाध्यापिका ने गणित-विज्ञान की अध्यापिका को टोका, "नजमा क्या होता है??
ये शब्द अनुपयुक्त है यहाँ पर उर्दू का शब्द "मज़मा" होगा।"
चूंकि अध्यापिका गणित-विज्ञान के अलावा हिन्दी, उर्दू के शब्दों पर पकड़ नहीं रखती थीं तो उन्होंने पुस्तक में गलत छपे हु शब्द नज़मा को सही मानते हुए छात्रों को अभ्यास कराया। प्रधानाध्यापिका के कहने पर नज़मा शब्द के स्थान पर मज़मा शब्द का प्रयोग करते हुए फिरसे नाटक का अभ्यास शुरु कराया।
😀😀😀😀😀

4- कविता और रेखा शिवजी के मंदिर में पूजा करने गईं। कविता ने शिवजी की पिण्डी पर चंदन का तिलक लगाया। 
रेखा बोली, "शिवजी बह रहे हैं!"
कविता एकदम चौंक कर बोली, "तू पागल है क्या??" "शिवजी बहरे हैं मैंने तो ऐसा कहीं नहीं पढ़ा कि शिवजी बहरे हैं सुन नहीं सकते।"
रेखा बोली, "शिवजी पर लगाया हुआ चंदन बह रहा है, शिवजी बहरे नहीं हैं।" 
तूने ये ज्यादा पानी डालकर चंदन घोल दिया है वह शिवजी की पिण्डी पर बह रहा है। इसलिए मैंने कहा शिवजी बह रहे हैं। शिवजी बहरे हैं नही कहा!!"
😀😀😀😀😀

5- अध्यापक ने छात्र से पूछा, " Tension का अर्थ क्या है??"
छात्र ने जबाव दिया, "Ten-Son", "दस बेटे।"
अध्यापक ने छात्र की तरफ देखकर बिना कुछ कहे आँखें तरेरी!!
अध्यापक को गुस्से में देखकर छात्र ने प्रश्न किया, "सर आपके दस बेटे हैं??"
अध्यापक ने कहा, "नहीं!!"
छात्र बोला, "फिर आप इतनी 'Tension' में क्यों आ गए?? मुझे तो लगा कि आपके दस बेटे हैं और मैंने आपकी दुखती रग (Ten-Son) पर हाथ रख दिया। आप Tension में आ गए, क्योंकि 'Ten-Son' ही 'Tension' का कारण हो सकते हैं!!
😃😃😃😃😃

6- आगरा(UP) से सैंया(UP) तक के सफर में तीन Bus Stoppage लगातार पड़ते हैं। जिनका नाम है रोहता, तेहरा और सैंया। 
बस ड्राइवर सवारी उतारने और चढ़ाने के लिए तीनों नाम एक साथ लेकर चिल्लाता है। मुख-सुख के कारण वह Bus Stoppage के नाम स्पष्ट नहीं पुकारता, बल्कि आवाज लगाता है "रोता तेरा सैंया, रोता तेरा सैंया।" सुनकर लोगों के चेहरे पर बरबस ही हंसी या मुस्कराहट आ जाती है।
😃😃😃😃😃

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 

Thursday, 23 February 2023

हत्या


करीब नब्बे के दशक की बात है छठी कक्षा में पढ़ने वाली कविता सात बजे स्कूल जा रही थी कि उसने देखा सड़क से कुछ दूर बहुत भीड़ है वहाँ पुलिस वाले भी खड़े हैं!!

स्कूल को भूलकर कविता भीड़ की ओर मुड़ गई।
वहाँ जाकर देखा कि एक बहुत बड़ा गड्डा जिसमें पानी भरा रहता था, गर्मी का मौसम है पानी सूख गया है, अब दलदल है एक आदमी का कंकाल उसमें धंसा दिखाई दे रहा है। पुलिस की संख्या बढ़
गई। धीरे-धीरे कंकाल बाहर निकाला गया,और जाँच के लिए भेज दिया गया। पुलिस के मुताबिक 
कंकाल छः से आठ माह पुराना हो सकता है। क्योंकि बारिश के दौरान इकट्ठा हुआ पानी गर्मी के दिनों में सूखने लगता है! इसलिए कंकाल नज़र आने लगा।

पुलिस की छानबीन शुरु हुई, गुमशुदा व्यक्तियों की 
सूचना पर नजर डाली तो इस दौरान आसपास के इलाके से करीबन 3 व्यक्ति गुमशुदा थे, एक 15-16 साल की लड़की, 20-22 साल का लड़का जो थोड़ा विक्षिप्त था और एक 55 साल का अधेड़। तीनों की छानबीन जारी थी। 

जांच में पता चला कि 6 माह पूर्व गायब हुए दिनेश रस्तोगी की लाश है। पारिवारिक सदस्य के डीएनए जाँच से मिलान हो जाने के साथ ही स्पष्ट हो गया।

पुलिस ने कंकाल परिवार को सौंप दिया और जाँच में जुट गई। परिवार से भी पूछताछ की कि अंतिम बार वह कहाँ और किसके साथ गए। परिवार ने बताया कि अपने दोस्त रमेश चंद्र के साथ ज्यादातर समय बिताते थे। दोनों की दुकानें पास-पास थीं इसलिए आना-जाना भी साथ-साथ करते थे।
गायब होने से पहले भी दोनों एक साथ थे। 

रमेश चंद्र के मुताबिक मैं अपने घर चला गया और दिनेश अपने घर। किन्तु वे घर नहीं पहुँचे। घर वालों ने दो दिन तक इंतजार किया, जगह-जगह तलाश की, खोज खबर न मिलने पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी लेकिन कोई खोज-खबर न लगी, मामला भी थोड़ा ढीला पड़ गया। 

कंकाल मिलने पर पुलिस ने तफ्तीश फिरसे शुरू करदी। पुलिस की तफ्तीश बार-बार रमेश चंद्र के घर आकर रुक जाती। रमेश एक जबाव देते कि दिनेश अपने घर की राह मुड़ गए थे। एक बार को तो पुलिस भी यही सोचने लगी कि दिनेश नशे में था हो सकता गड्डे के पास से गुजरते हुए उसका पैर फिसल गया हो और वह दलदल से न निकल पाया हो। जाँच में सिर की हड्डी टूटी बताई गई है उसकी वजह गड्डे में किसी पत्थर से टकराना भी हो सकता है। 

किसी ने मर्डर किया हो ऐसी भी कोई वजह नजर नहीं आ रही!!

तभी एक खबरी के द्वारा सुराग दिया गया कि दोनों थोड़ी दूर पर रहने वाली एक विधवा शारदा जिसकी उम्र 40-45 के आसपास रही होगी अक्सर उससे मिलने जाया करते थे और अच्छा-खासा वक्त उसके साथ बिताते थे। रमेश बाद में भी शारदा से मिलता रहा लेकिन कुछ दिन पहले उसने उससे मिलना-जुलना छोड़ दिया है। 

बस क्या था पुलिस पहुंच गई शारदा के घर पूछताछ में शारदा ने इतना ही बताया कि दिनेश कभी कभी आता था और जिस दिन गायब हुआ था उस दिन भी आया था। करीबन 4 घण्टे शारदा के घर हंसी मजाक करने के बाद दोनों लौट गए।
शारदा ने बताया कि उसने अगले दिन दिनेश से आने के लिए आग्रह किया था लेकिन वह फिर कभी नहीं आया!!

पुलिस ने अंधेरे में तीर फेंका और एक बार फिर रमेश से सख्ती से पूछताछ की, "शारदा दिनेश को पसन्द करने लगी तो तूने उसे मार डाला। पुलिस की सख्ती के आगे रमेश टूट गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया!!

उसने बताना शुरू किया कि दो साल पहले उसकी पत्नी का देहान्त हो गया था। दो-तीन महीने के बाद ही शारदा से उसकी बातचीत शुरू हो गई। वह उसके घर जाने लगा। धीरे-धीरे वह खाली वक्त शारदा के यहाँ बिताने लगा, उसके घरेलू खर्चों की पूर्ति करने लगा। सब कुछ अच्छा चल रहा था एक दिन दिनेश को मैं अपने साथ ले गया। दिनेश पैसे के बल पर और अपनी लच्छे दार बातों से शारदा को लुभाने लगा। शारदा भी उसपर आसक्त हो रही थी। 

मैंने दिनेश को बहुत समझाया कि तेरी पत्नी है, अपनी पत्नी को देख, शारदा से दूर रह लेकिन वह नहीं माना। उस दिन हम दोनों अपने-अपने रास्ते मुड़ गए थे। 

करीबन आधे घण्टे बाद मैं शारदा से मिलने गया तो हैरान रह गया क्योंकि दिनेश वहाँ पहले से मौजूद था, मुझे बहुत बुरा लगा मैंने शारदा से बातों ही बातों में कहा कि दिनेश तुम्हारे पास आ रहा है तो मैं आना बन्द कर देता हूँ। शारदा ने मेरी बात को हंसकर नजरंदाज कर दिया!! 

मैं अंदर ही अंदर स्वयं को बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। मैंने बहुत कोशिश की कि दिनेश शारदा के घर से चला जाए लेकिन वह खड़ा नहीं हुआ। हम दोनों एक साथ शारदा के घर से निकले।

रास्ते में मेरी दिनेश के साथ कहासुनी होने लगी मैंने उससे कहा, "तू शारदा के घर नहीं जाएगा!!"

उसने कहा, "शारदा मुझे चाहती है मैं जरूर जाऊंगा।। तुझे शारदा के घर नहीं जाना चाहिए!!"

इतना सुनते ही मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैंने दिनेश को जोर का धक्का दे दिया, वह दीवार से टकराया और उसका सिर फूट गया। खून की धार बह निकली वह बेहोश हो गया। मैंने घसीट कर पानी और दलदल से भरे गड्डे में पटक दिया। वह थोड़ी देर छटपटाया और दलदल में धंसता चला गया।  

उसके बाद मैंने शारदा से कई बार कहा कि हम शादी करलें लेकिन वह हंसकर टाल देती इसी तरह चार महीने बीत गए। एक दिन मैं शारदा के घर गया तो उसने मुझे अंदर नहीं आने दिया कहा, "बाद में आना।" 

मैंने कहा, "थोड़ी देर बाद चला जाऊंगा।" 

लेकिन वह नहीं मानी। दरवाजा बंद करके अंदर चली गई। मैं थोड़ी देर किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया। उसके बाद खिड़की की झिरी में से झांकने लगा। अंदर का नजारा देखकर मैं आपे से बाहर हो गया और फिर से दरवाजा खटखटा दिया। शारदा ने दरवाजा खोला मैं दनदनाता हुआ अंदर घुस गया और अंदर बैठे व्यक्ति से भिड़ गया। उसके साथ शारदा भी शामिल हो गई। दोनों ने मुझे धक्का देकर घर से बाहर धकेल दिया, कभी न आने की धमकी दी। 

उसके बाद मैंने शारदा के घर कभी कदम नहीं रखा। मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है उस दिन के बाद मैं चैन की नींद नहीं सो पाया। जिसके लिए ये गुनाह किया उसने भी मुझे धोखा दे दिया!! इतना कहकर रमेश चंद्र हताश सा जमीन पर बैठ गया!!
पुलिस ने कहा, "अब बाकी का पछतावा जेल में करना!!"

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)












Wednesday, 22 February 2023

धोखा

घर में बहुत चहल-पहल थी गोविंद के ताऊ की बेटी की लगुन थी 30 जनवरी 1948 को बारात आनी थी। 5वीं कक्षा में पढ़ने वाला गोविंद बहुत खुश था। घर में महमानों की भीड़ थी। नाच-गाना चल रहा था। मिठाइयाँ बन रही थीं, उसने अपने सब दोस्तों को बुलाया था, सभी मौजमस्ती और दावत उड़ाने में मग्न थे।
11 बजे लगुन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
शादी का दिन भी आया बारात आ गई। घर में तैयारियाँ चल रही थीं लेकिन बाहर सब शान्त था। भारत शोक मना रहा था क्योंकि नाथूराम गौडसे नामक व्यक्ति ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को गोली मार दी थी। सब दुखी थे। शादी की तैयारियाँ फीकी पड़ गईं। बहुत से रिश्तेदार शादी में शामिल नहीं हो पाए। बारात भी आई कुछ गिने-चुने लोग लेकर, बारात की चढ़ाई भी शुरू हुई लेकिन कोई धूम-धड़ाका नहीं, बैंड-बाजा भी साथ चल रहा था लेकिन वह बैंड बज नहीं रहा था, क्योंकि खुशी मनाने पर रोक थी। सिर्फ आवश्यक कार्य सम्पन्न हो रहे थे जिन्हें रोका नहीं जा सकता। शान्ति के माहौल में शादी सम्पन्न हुई और गोविंद की बहन ससुराल विदा हो गई। कुछ दिनों में बात आई-गई हो गई।
गोविंद के पिता दो भाई थे। शिवदयाल जो कि ब्याज पर लेन-देन का कार्य करते थे और सूरजभान सरकार के मुलाजिम (पटवारी) थे।
शिवदयाल के परिवार में एक बेटा दो बेटियाँ थीं और सूरजभान के परिवार में दो बेटे एक बेटी थी।
शिवदयाल की दोनों बेटियों की शादी हो गई। बेटा अविवाहित था। सूरजभान के तीनों बच्चे अविवाहित थे। गोविंद सबसे बड़ा 5वीं कक्षा का छात्र था। उससे छोटा चेतन 4थी कक्षा में पढ़ता था। छोटी बहन शान्ति।
ताऊजी की छोटी बेटी कमला की शादी को चार माह ही बीते थे कि सूरजभान (गोविंद के पिता) का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। सूरजभान के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
पत्नी रामश्री (गोविंद की माँ) निरक्षर और दुनियादारी से दूर, पूर्णतया जेठ शिवदयाल पर निर्भर!!
वैसे भी दोनों भाई इकट्ठे रहते थे।
दोनों की पत्नियाँ बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ। दोनों ही लेन-देन की बातें और रुपए-पैसे के बारे में पत्नियों को नहीं बताते थे। जो भी कुछ था दोनों भाइयों के बीच ही सीमित था।
सूरजभान की मौत को एक साल भी नहीं बीता था कि शिवदयाल ने चुपके से जमीन-जायदाद बेच दी और सारी धन-सम्पत्ति समेटकर अपने बेटे और पत्नी के साथ नासिक भाग गए।
सूरजभान का परिवार बेघर और बेसहारा हो गया।
सूरजभान की पत्नी रामश्री को परिवार सहित अपने भाई चन्द्रशेखर के यहाँ शरण लेनी पड़ी। इस आवा-जाही में दो वर्ष बीत गए।

रामश्री ने समझदारी से काम लेते हुए जो भी थोड़े-बहुत जेवर थे उन्हें बेचकर, घर के बर्तनों से रस्में पूरी करते हुए 9 वर्षीय बेटी शान्ति का विवाह सम्पन्न कर दिया।
चन्द्रशेखर के प्रयास से 7वीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही गोविंद को लिपिक के पद पर सरकारी नौकरी मिल गई। घर के हालात सुधरने लगे। रामश्री भाई का घर छोड़कर किराए के मकान में रहने लगीं।
नासिक जाकर शिवदयाल ने व्यवसाय प्रारंभ किया और अपनी जीविका चलाने लगे। कुछ दिनों में अपने बेटे का विवाह कर लिया। रामश्री को भी बेटे के विवाह का न्योता भेजा गया किन्तु रामश्री ने विवाह में जाना उचित न समझा। बेटे की पत्नी सुन्दरता के साथ-साथ बहुत तेज-तर्रार थी। वह सास-ससुर की बेइज्जती का कोई भी मौका नहीं छोड़ती।
दो साल बाद ही गोविंद की शादी हो गई। एक साल बाद बेटी पैदा हुई। दूसरी बार बेटा पैदा हुआ किन्तु गर्भावस्था के दौरान कुछ नाजुक स्थिति होने के कारण पत्नी ने दम तोड़ दिया। दोनों बच्चे बिन माँ के हो गए।
एक वर्ष तक दादी (रामश्री) ने बच्चों की देखभाल की। उसके बाद उन्हें भी दिल का दौरा पड़ा और दुनिया से चली गईं।
एक-डेढ़ साल बाद गोविंद का दूसरा विवाह हो गया। सुघड़ पत्नी आ गई उसने सब कुछ संभाल लिया!!
उधर नासिक में शिवदयाल की भी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के पश्चात बहू सुमन ने सास के साथ मारपीट की उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। 24 घण्टे तक वह घर के बाहर भूखी-प्यासी बैठी रोती रही।
इस बीच बेटा मां को अंदर लाने के लिए पत्नी से मिन्नतें करता रहा, जब वह किसी भी तरह नहीं मानी तो बेटा मां को गोविंद के घर छोड़ गया। गोविंद के ताऊ शिवदयाल की पत्नी मरते दम तक गोविंद के साथ रही। गोविंद की पत्नी ने उन्हें पूरी उम्र सम्मान के साथ रखा।
जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके बेटे-बहू को सूचित किया गया। उनकी बहू ने आने से इन्कार कर दिया, चार दिन बाद बेटा आया, तब तक गोविंद अपनी ताई का पूरे सम्मान के साथ दाह-संस्कार कर चुका था। शिवदयाल का बेटा अपनी लाचारी पर बहुत शर्मिन्दा था!! गोविंद की वाह-वाही का चर्चा सबकी जबान पर था!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"

धौलपुर (राजस्थान )


सबक

उषा जी सड़क पर चली जा रही थी एक कार ने बिल्कुल उनके करीब ब्रेक लगाए, हड़बड़ाहट में वे गिर पड़ीं!! गाड़ीवाला नीचे उतरा और उषा जी को सहारा देकर उठाया, "आँटी आपको चोट तो नहीं लगी, आप ठीक हैं??"
उषा जी ने हाँ में सिर हिलाया!!
गाड़ीवाला: आप कहाँ जाएंगी, बताइए मैं आपको छोड़ दूँगा??
जवाब में उषा जी के आंसू बहने लगे वे कुछ न 
बोल पाईं!!
गाड़ीवाला: "अरे! आप रोइए मत, आइए मेरे साथ।"
गाड़ीवाले ने उषा जी को सहारा दिया और अपनी कार में बिठाया, फिर पानी पिलाया, "आप कुछ खाएंगी??"
उषा जी ने ना में सिर हिला दिया!!
गाड़ीवाला: देखिए आंटी जी मेरा नाम सुमित है, मैं आपके बेटे जैसा हूँ, आपकी कोई समस्या है तो मुझे बताइए??
उषा जी कुछ न बोली, अपने आंसू पौंछती रहीं!!
सुमित: "आंटी एक काम करते हैं आप मेरे घर चलिए, वहाँ आराम से बात करेंगे।" (कहते हुए सुमित ने कार अपने घर की तरफ मोड़ ली)
घर के बाहर कार रोककर उषा जी को सहारा देते हुए वह घर के अंदर ले आया और खाने की मेज पर बिठा दिया!
अपनी माँ को आवाज दी, "माँ ये आंटी बहुत परेशान है, मुझे तो कुछ नहीं बताया, जरा आप इनसे बात कीजिए!!"
सुमित की माँ रेखा ने उषा जी के कंधे पर हाथ रखा, तो आंसू भरी आँखों से उषा जी उनकी तरफ देखने लगी।
रेखा ने नौकरानी से खाना लगाने को कहा।
रेखा: "आप परेशान मत होइए, निश्चिंत होकर खाना खाइए!"
बार-बार आग्रह करने पर उषा जी ने खाना शुरू किया।
उषा जी भूखी थीं उन्होंने शांति से खाना खाया!! 
तब तक सुमित के पिता रमाकांत जी आ गए।।
सुमित की मां ने उषा जी के बारे में बताया!!
रमाकांत: "जब आपका मन करे तब अपनी परेशानी मुझे देना मैं आपकी हर संभव मदद करूँगा!!"
उषा जी को ताज्जुब हो रहा था कि ऐसे लोग भी हैं दुनिया में!!
वह बोली, "मेरी समस्या का कोई हल नहीं, मेरा परिवार ही मेरे दुख का कारण है!!
रमाकांत: अरे! "आप बताइए तो सही, समस्या निपटाना ही तो हमारा काम है!!"
उषा जी ने रोते-रोते अपनी आपबीती रमाकांत के समक्ष सुनाना शुरू किया!!
6 माह पहले मेरे पति की मौत हुई है, तभी से मेरे बुरे दिनों की शुरुआत हुई!!
मैं अपने पति की मौत को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। मेरे पति हृदय गति रुक जाने से भगवान को प्यारे हो गए, लेकिन मैं अपने पति की यादों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहीं थी। 
घर में अन्य सदस्य भी थे इकलौता बेटा कबीर, बहू कविता और 6 वर्षीय पोती। 
पति को मरे 20 दिन ही हुए थे कि बहू ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। बहू को आते देखकर मैं अपने आँसू छिपाने लगी!!
बहू: मांजी कब तक रोती रहेंगीं, ससुर जी आपके आँसू पौंछने नहीं आयेंगे, खुद को संभालने और घर के काम-धाम में मन लगाइए, बैठै-बैठे शरीर बेकार हो जाएगा कौन ले जाएगा आपको बार-बार डाॅक्टर के पास??
उषा जी कुछ न बोली!!
थोड़ी देर बाद बहू फिर आई, फिरसे अपनी बात दोहराई।
उषा जी ने अनसुनी कर दी, बहू उन्हें घसीटती हुई रसोई में ले गई, खाना बना लीजिए बाद में रोती रहना!!
उषा जी खाना बनाने लगीं। वे घर के कामों में स्वयं को व्यस्त रखने लगीं। 
सुबह से शाम तक काम में व्यस्त रहती और बहू के हुक्म की तामील करती रहती। शाम तक बुरी तरह थक जातीं। 
एक दिन कबीर से बोली, "बेटा एक काम वाली रख ले, मैं बहुत थक जाती हूँ!!"
कबीर: माँ आप दोनों हैं घर में, काम ही कितना है??
कविता बीच में बोल पड़ी, "मैं तो माँ जी से कोई भी काम न कराऊँ, लेकिन पड़े-पड़े शरीर खराब हो जाएगा, हमें ही बार-बार डाॅक्टर के पास लेकर भागना पड़ेगा, इसलिए माँजी थोड़े हाथ-पैर हिलाना अच्छी बात है!!"
कबीर: "कविता सही कह रही है माँ, आपका कितना ख्याल रखती है, हर वक्त माँ-माँ करती हुई आपके पीछे भागती रहती है।"
उषा जी चुप हो गईं, बेटा बहू की हाँ में हाँ मिला रहा था, अपनी पीड़ा किसको दिखाएं??

उषा जी खामोश हो गईं। किसी से कोई गिला-शिकवा नहीं, मन ही मन, घुटती रहती!!
6 माह बीत गए। एक दिन उनकी तबियत खराब हो गई, किसी तरह रसोई का काम खत्म करके अपने कमरे में आकर बिस्तर पर पड़ गई, बुखार से बदन तप रहा था आँख बन्द होने लगी थी कि बहू की आवाज सुनाई दी, "अरे! माँजी, चाय बना दीजिए, मेरी सहेली आई है, कितना सोती हैं आप??
उषा जी उठीं धीरे-धीरे चलकर रसोई में पहुंची, उन्होंने चाय बनाई, कांपते हुए कमरे में लेकर आई,
बहू की सहेली को चाय देते वक्त हाथ कांपे और चाय उसकी साड़ी पर गिर गई!!
सहेली गुस्से से तमतमा कर खड़ी हुई, "ए बुढ़िया हाथों में जान नहीं है क्या??" (कहते हुए जोरदार धक्का दे दिया) 
उषा जी दरवाजे के पास जाकर गिरी, वह उठने का प्रयास कर ही रही थी कि कविता तो जैसे मौके की तलाश में थी, उषा जी को घसीटते हुए ले गई और बाहर धकेल दिया, "निकल बुढ़िया तू किसी काम की नहीं, मर जा कहीं जाकर, दुबारा घर के अंदर मत आ जाना!!"
उषा जी घर के बाहर कब तक पड़ी रही, उन्हें नहीं पता?? बेटे के स्पर्श से उन्हें होश आया!!
कबीर: "माँ बाहर क्या कर रही हो, तुम्हें तो तेज बुखार है??"
उषा जी: "कविता ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया है, कहा कि कहीं जाकर मर जा।"
कविता: माँजी आप तो दवा लेने गई थीं, आपका बुखार इतना कैसे बढ़ गया, आपने दरवाजा क्यों नहीं खटखटाया, आप ये क्या अनाप-शनाप बक रही हैं, मैं तो आपका कबसे इंतजार कर रही थी कि आप कहाँ रह गईं?? मैंने आपसे साथ चलने को कहा था आपने मना कर दिया!!"
कबीर: अरे! "ज्यादा बुखार है इसलिए अर्रक-जर्री दे रही हैं!!"
कबीर ने उषा जी को बिस्तर पर लिटाया और दवाई दी। कविता को हिदायत दी कि वह माँ को कल डाॅक्टर के पास ले जाए!!

कबीर के जाते ही कविता उषा जी से बोली, "जाओ यहाँ से किसी वृद्धाश्रम मे जाकर डेरा जमा लो, ताकि हम चैन से रह पाएं, मैं नहीं चाहती कि तुम्हें कल की तरह धक्के देकर निकालूँ??"

उषा जी चुपचाप उठीं अपनी छड़ी उठाई और घर से बाहर निकल गईं, सोचती जा रही थी कि ऐसी जिल्लत से क्या फायदा, किसी गाड़ी के नीचे आकर अपनी जान क्यों न देदूं?? ये सोचकर सड़क के बीचोंबीच चलने लगी!!
इतना कहकर उषा जी चुप हो गई।
रमाकांत: "मैं आपकी बात समझ गया, अब आप क्या चाहती हैं??"
उषा जी प्रश्न भरी निगाहों से रमाकांत जी को देखने लगी!!
रमाकांत: "देखिए अगर आप बेटे-बहू के साथ रहना चाहती हैं तो बताइए, घर बेचना चाहती हैं तो बताइए या बेटे-बहू से घर खाली करा कर उसमें रहना चाहती हैं तो बताइए। जो आप चाहेंगी वही होगा??"
उषा: "मैं बहू-बेटे के साथ तो बिल्कुल नहीं रहना चाहती क्योंकि बहू मजबूरी में सुधरने का ढोंग करेगी सुधरेगी नहीं, इसलिए मुझे दिक्कत होगी।
मैं घर बेचना भी नहीं चाहती क्योंकि मैं अपने घर में पति की यादों के साथ रहना चाहती हूँ!!"
रमाकांत: "ठीक है! हम कल ही आपके घर चलते हैं और 10 दिन का समय देकर घर खाली कराते हैं 
लेकिन आप बेटे को देख कर कमजोर मत पड़ जाना!!"
उषा: नहीं! नहीं! ऐसा नहीं होगा!
अगले दिन सुबह 9 बजे के लगभग उषा जी के घर के सामने कार रुकी जिसमें से रमाकांत, सुमित और उषा जी बाहर निकले और घर के अंदर प्रवेश किया!
माँ को देखते ही कबीर बोला, "अरे! माँ कहाँ थी आप, हाॅस्पीटल से कहाँ चली गईं थीं?? मैं कितना परेशान हूँ, कल से आपको ढूंढ़ रहा हूँ!!
कबीर की बात सुनकर उषा जी उसका मुँह ताकने लगीं!!
कबीर: बोलो न माँ! "कल आप कविता के साथ अस्पताल गईं, फिर आप कहाँ चली गईं?? कविता शाम तक आपको ढूँढ़ती रही!!"
"मैं घर आया तो मुझे पता चला कि आप अस्पताल से चुपके से कहीं चली गई, तब से मैं आपको ढूंढ़ रहा हूँ, कुछ बताओ माँ??
लेकिन उषा जी कुछ न बोली!!
रमाकांत: "देखिए मि. कबीर मैं उषा जी का वकील हूँ, आप ये घर 10 दिन के अंदर खाली कर दें उषा जी आप लोगों को अपने साथ नहीं रखना चाहती।"
इतना सुनते ही कविता के पैरों तले जमीन खिसक गई, वह एकदम बोली, "ऐसा कैसे ये हमारा घर है,
ससुर जी का बनवाया हुआ, हम यहाँ से क्यों जाएं??"
रमाकांत: "क्योंकि उषा जी ऐसा चाहती हैं!! ये घर उनके नाम पर है, अगर उनके पति के नाम पर होता तो भी मर्जी की मालिक उषा जी ही होती! आप तो ये बताइए कि 10 दिन में घर खाली हो जाएगा या नहीं??"
कविता: ऐसे कैसे हो जाएगा, हम कहीं नहीं जाएंगे! माँजी आप ये कैसे कर सकती हैं?? कोई गलती हुई है तो मैं आपसे माफी मांगता हूँ!
रमाकांत: ठीक है कल मैं कोर्ट का आदेश...
कबीर जो परिस्थिति को समझने का प्रयास कर रहा था बीच में ही बोला, "नहीं वकील साहब मैं 10 दिन में घर खाली कर दूंगा कोर्ट के आदेश की जरूरत नहीं है, लेकिन मैं इस सबकी वजह जानना चाहता हूँ कि आखिर मेरी माँ को इतना बड़ा कदम क्यों उठाना पड़ रहा है??"
उषा जी की तरफ देखते हुए, "बताइए न माँ क्या बात है??"
उषा जी कुछ न बोली!!
कविता: उषा जी के पैर पकड़कर माफी मांगते हुए, "माँजी मुझे माफ कर दीजिए!!"
उषा जी ने अपने पैर पीछे खींच लिए!!
रमाकांत: "चलिए उषा जी!!"
कबीर: "माँ मैं 10 दिन में घर खाली कर दूंगा लेकिन ये 10 दिन तो आप मेरे साथ रहिए!!"
उषा जी बिना कुछ कहे कार की ओर मुड़ गई!!
उनके जाते ही कबीर धम्म से सोफे पर बैठ गया जैसे शरीर से जान निकल गई हो!! न खाना खाया न ही ऑफिस गया। सोफे पर ही पड़ा रहा। कविता ने कई बार खाना खिलाने का प्रयास किया। भूख नहीं है कहकर मना कर दिया।
कविता मन ही मन पछता रही थी उसने तो सोचा ही नहीं कि अनपढ़ गंवार बुढ़िया वकील के भी पास जा सकती है??
कबीर उठा और सीधे रमाकांत जी के घर जा पहुंचा, देखते ही माँ से लिपट गया दोनों माँ-बेटे फूट-फूट कर रोए। बेटे ने माँ से साथ न रहने की वजह पूछी!!
उषा जी चुप रहीं वह नहीं चाहती थीं कि बेटा-बहू के बीच दरार पैदा हो!!
लेकिन रेखा और सुमित ने उषा जी का कहा हुआ एक-एक शब्द कबीर को बता दिया। बहुत शर्मिंदा
हुआ, "इतना कुछ हो गया माँ आपने बताया क्यों नहीं??"
उषा: "बताया था बेटा!! जब मैं दरवाजे के बाहर पड़ी थी" "कविता ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया है, तुझे लगा कि मैं बुखार की वजह से अनाप-शनाप बक रही हूँ!!"
कबीर को माँ की कही एक-एक बात याद आ गई, मैं ही कितना पागल था कुछ समझ ही न पाया!!
उषा: "जो भी हो बेटा तू कविता से कुछ मत कहना मैं नहीं चाहती कि तुम दोनों के बीच कोई खटास आए!!"
कबीर: माँ आपका दिल बहुत बड़ा है, अब भी उसी के बारे में सोच रही हैं!!
कबीर घर चला गया। रोजाना माँ से मिलने आता रहा। 10 दिन के अंदर ही उसने किराए का घर लेकर माँ का घर खाली कर दिया।
कविता उसे लगातार कहती रही कि माँ कहाँ हैं पता करके उन्हें किसी भी तरह मनाने की कोशिश करो हम कहाँ जाएंगे, कैसे रहेंगे किराए के मकान में??
10 दिन बाद उषा जी ने सुमित और कबीर के साथ अपने घर में प्रवेश किया! 
कबीर ने माँ की देखभाल और घर के कामकाज के लिए एक प्रौढ़ महिला की व्यवस्था कर दी।
रोजाना ऑफिस से सीधा माँ के पास आता आधा घण्टा रुकता फिर अपने घर चला जाता!!
उषा जी भी खुश रहती, काम वाली पूरे दिन उनके पास रहती शाम को अपने घर चली जाती!!
कविता बार-बार पूछती, "माँजी अपने घर रहने आ गई क्या??"
कबीर का जवाब होता, " मुझे नहीं मालूम!"

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)


माता अरुंधति

माता अरुंधति ने अत्यंत कठिन तपस्या करने के उपरांत भगवान विष्णु से वरदान मांगा कि महर्षि वशिष्ठ उनके पति बने। भगवान विष्णु ने उन्हें दिव्य ज्ञान, दिव्य वाणी और दिव्य दृष्टि प्रदान की एवं तीन वरदान और मांगने को कहा।

अरुंधति ने विश्वकल्याण हेतु तीन वर मांगे। 

1. संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी बाल्यकाल तक काम वासना से मुक्त रहे। 
बालक और कन्याओं पर कामदेव का कोई वश न चले!!

2. मैं अपने पति वशिष्ठ के अलावा किसी भी पुरुष को कामवासना से ना देख सकूं और यदि कोई परपुरुष मेरी ओर कुदृष्टि से देखे तो सदा के लिए कामवासना से रहित हो जाए!!

3. मैं अखंड सौभाग्यवती रहूं और मेरा पातिव्रत्य धर्म अखंड रहे!!

भगवान विष्णू ने कहा, तथास्तु!
माता अरुंधति की इच्छा पूर्ण हुई!!

माता अरुंधति द्वारा भगवान विष्णु से माँगे गए तीनों वरदान का महत्व जान कर अंतस में कौंधने वाला एक विचार बार-बार व्यग्र करने लगा कि माता अरुंधति जगत माता, श्रद्धेय एवं पूजनीय थीं जिन्होंने भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाने में महत्पूर्ण योगदान दिया। जगत कल्याण में सहभागी बनी। ऋषि विश्वामित्र ने द्वेष वश उनके 100 पुत्रों की राक्षसों द्वारा हत्या करा दी। अरुंधति ने उन्हें क्षमा कर ब्रह्मज्ञान दे दिया और राक्षसों को भी क्षमा कर दिया। 

राम को गले लगा कर वात्सल्य से अभिभूत हो गईं। जगत कल्याण में सहायक बनी राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बना दिया। 
उन्ही अरुंधति माँ ने विष्णु से तीन वर मांगे मात्र स्वयं के लिए, जगत कल्याण को बिसार दिया।

पिछले जन्म में वह ऋषि वशिष्ठ की शिष्या थीं।
ऋषि के तेज और दिव्यता से प्रभावित वह काम के वशीभूत हो ऋषि की पत्नी बनने की कामना करने लगीं। ऋषि की पत्नी बनने की इच्छा तीव्र होती गई। परन्तु गुरु-शिष्य धर्म में ये अपरिहार्य है।
धर्म गुरु-शिष्य के विवाह की अनुमति नहीं देता।

अंततः उन्होंने कठोर तप किया और भगवान विष्णु से वर मांगा। चूंकि वह बाल्यावस्था में कामवासना से वशीभूत हो ऋषि वशिष्ठ से प्रभावित हुई थीं इसलिए उन्होंने प्रथम वर यही मांगा कि बालक और कन्याओं पर कामदेव का वश न चले, जो कि जगत कल्याण में सहायक हुआ। आज भी छोटे बच्चों और कन्याओं पर कामदेव का वश नहीं चलता, वे कामवासना से दूर रहते हैं।

चूंकि वह ऋषि वशिष्ठ पर इस भांति मुग्ध थीं कि द्वितीय वर मांगते समय जगत को विस्मृत कर गईं और स्वयं का सुख सर्वोपरि रखा। मात्र अपने लिए वर मांगा कि "मैं अपने पति वशिष्ठ के अलावा किसी भी पुरुष को कामवासना से ना देख सकूं और यदि कोई परपुरुष मेरी ओर कुदृष्टि से देखे तो सदा के लिए कामवासना से रहित हो जाए!!"

काश उन्होंने ये वरदान सम्पूर्ण नारी जाति एवं पुरुष वर्ग के लिए मांगा होता तो कोई भी महिला, कन्या शोषण, जबरदस्ती व बलात्कार का शिकार न होती। पुरुष भी कन्याओं के प्रति कलुषित विचार व कुदृष्टि न ला पाते। 

तृतीय वर अखंड सौभाग्यवती होना एवं पातिव्रत्य धर्म अखंड बना रहे ये भी उन्होंने मात्र स्वयं के लिए मांगा!! 

इस वरदान को भी वह सम्पूर्ण नारी जगत के लिए
मांग सकती थी। अगर ऐसा होता तो यह वरदान अकाल मृत्यु रोकने में बहुत बड़ा सहायक बनता।
किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया!!

जब देवी-देवता ही स्वार्थ से परे नहीं हैं तो मानव की क्या बिसात।

देव, मुनि, ऋषि, मनुष्य एवं ईश्वरीय शक्ति को तो दोष दिया ही नहीं जा सकता क्योंकि वे तो वरदानी हैं। वरदान देते हैं उन्हें किसी से वरदान पाने की आवश्यकता नहीं है। वह किसी देवी या नारी पर मोहित होते हैं तो उसे पाने के लिए या विवाह करने के लिए तपस्या करने की जरुरत नहीं है, वह उसे बलात् पा सकते हैं क्योंकि वे बलिष्ठ हैं और मनचाही वस्तु या स्त्री बलात् अधिगत कर लेना उनका जन्म सिद्ध अधिकार है।

इतिहास, ग्रंथ, महाग्रंथ, वेद, पुराण साक्षी हैं कि किसी भी राजा, देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने किसी भी देवी, स्त्री पर मोहित होने के उपरांत उससे विवाह करने के लिए कोई तपस्या नहीं की, कोई वरदान नहीं मांगा। किन्तु लिप्सा अवश्य पूर्ण की, वह भी बलात्। 

वही आदर्श जगत के समक्ष प्रस्तुत किए। इंसान उसपर चल रहा है। स्त्री का तो अस्तित्व ही समाप्त कर दिया है। स्त्री मात्र वस्तु, मनोरंजन का साधन और भोग्या बन कर रह गई है। हर कोई आंचल खींचकर चला जाता है।

कोई भी कार्यक्षेत्र हो!! घर, कार्यस्थल, नौकरी में उच्च पद पर आसीन फिर भी अस्मत और आंचल बचाने के लिए 80% महिलाओं को लड़ाई लड़नी पड़ती है। 

सिर्फ 10% ही स्त्री वर्ग है जिसे इस दुखदायी एवं कलुषित व्यवस्था से सामना नहीं करना पड़ता।

10% स्त्री वर्ग ऐसा भी है जो परिस्थितयों से समझौता कर आंचल स्वयं ही ढलका देता हैं।
क्या करें काम तो करना ही है। 
"पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर" कब तक??

कुछ कर्मठ लोग अपने उसूल पर चलते है।
"कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं, बल्कि कुछ करना पड़ता है।" 
इस उसूल पर चलने वाली दिलेर महिलाएं हार नहीं मानतीं, परिस्थितियों से समझौता नहीं करतीं, किन्तु ऐसी स्त्रियाँ ज्यादती और हादसों का शिकार होती रहती हैं क्योंकि पुरुष वर्ग अहम पर चोट बर्दाश्त नहीं कर पाता। उन्हें जड़ से उखाड़ फैंकता है!!

कहीं-कहीं महिला वर्ग भी कलुषित वातावरण बनाने में पीछे नहीं है। वह कामकाजी बनकर बाहरी कार्यक्षेत्र में आ तो जाती हैं। लेकिन कठिन परिश्रम एवं अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदार नहीं रह पातीं। कामचोरी एवं दूसरों पर निर्भर रहने की आदत पुरुष वर्ग का मुँह ताकने पर मजबूर करती है।

वह स्वयं को दुर्गम रास्ते पर चलने के लिए तैयार न करके, सुगम मार्ग से पूर्ण करना चाहती हैं। ये मौका परस्त महिलाएँ अपने स्वाभिमान और सम्मान को गिरा कर पुरुष वर्ग का सहारा लेने से कभी नहीं चूकती, अपने कार्यक्षेत्र और परिचित स्थान पर बदनाम होती हैं। कलुषित प्रवृत्ति का पुरुष ऐसी महिलाओं के लिए कतार में रहता है और उसका फायदा उठाने का प्रयास करता है। ऐसी महिलाएँ, सच्चरित्र महिलाओं के रास्ते दुर्गम बनाती हैं, छवि बिगाड़ती हैं, जो अपनी मंजिल बिना सहारे के अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर पूर्ण करना चाहती हैं।

उदाहरणतः किसी महिला की सरकारी नौकरी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालय, पंचायत घर, PHC अस्पताल या ऐसे ही किसी स्थान पर लग जाए तो वह महिला (सभी नहीं) सुदूर क्षेत्र में रोजाना जाने से बचने के लिए जुगाड़ बिठाएगी। 

प्रथम प्रयास: रोज ना जाना पड़े, एक दिन जाकर 10 दिन के हस्ताक्षर हो जाएं। 

द्वितीय प्रयास: बस पकड़ कर रोज कौन जाए?? कोई पुरुष साथी कर्मचारी अपने साथ अपने वाहन पर बिठा कर ले जाए।

तृतीय प्रयास: ऑफिस में ही किसी तरह प्रतिनियुक्ति मिल जाए, दो-चार घण्टे गुजारो, घर का रास्ता पकड़ लो।

चतुर्थ प्रयास: ऑफिसर को लटके-झटके दिखा कर बिल्कुल ही न जाना पड़े, घर ही हस्ताक्षर करा ले जाए, ये सबसे अच्छा।

बिना हाथ-पैर हिलाए नौकरी और पैसा दोनों। बस ऑफिसर मुट्ठी में। वह रात 12:00 बजे घर में आए या सुबह 4:00 बजे। उसे सब छूट है। उसी की मेहरबानी से ही बिना कार्यक्षेत्र मे दाखिल हुए महीने की पहली तारीख को बैंक खाते में तनख्वाह आएगी। उसी तनख्वाह को अपनी गैरत दांव पर लगा कर, बेगैरत, दल्ला पति के साथ मिलकर डकारेगी और बेटा-बेटी के भविष्य की नींव बेगैरत, स्वाभिमान रहित, खोखला बनाएगी।

"इस हाथ ले उस हाथ दे।" 
इस दुनिया का यही उसूल है। अपना स्वार्थ और सुख सर्वोपरि है। 
"कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है।"

कोई किसी से अपना काम निकलवाना चाहता है तो बदले में कुछ तो करना ही पड़ेगा!!

कहते हैं न "एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है।" पुरुष वर्ग तो वैसे ही महिलाओं के क्षेत्र में पूर्णतया अपनी घुसपैठ बनाए हुए है। 

इस्मत चुगताई के अनुसार: "यह मर्द की दुनिया है। मर्द ने बनाई और बिगाड़ी है। औरत एक टुकड़ा है उसकी दुनिया का जिसे उसने अपनी मोहब्बत और नफ़रत के इज़हार का ज़रिया बना रखा है। वह उसे मूड के मुताबिक पूजता भी है और ठुकराता भी है।"

इसी मानसिकता को बढ़ावा ये मौकापरस्त महिलाएँ देती हैं। महिलाओं के विरुद्ध पुरुषों की सहायक बनती हैं!!

क्या कभी ऐसा समय आएगा जब पुरुष की कामुक निगाहें आंचल को भेदती हुई स्त्री की देह नापना बंद कर पाएंगी??

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 


पीड़ा

मधु तुम्हारे प्रसव का वक्त नज़दीक आ रहा है, कल मेरी छुट्टी है तुम्हें मायके छोड़ दूँ! मधु के पति रमन ने कहा!
मधु: नहीं! पिछली बार जब गुड़िया का प्रसव मायके में हुआ तो भाभी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, मैं मायके नहीं जाना चाहती!!
रमन: तो माँ को यहाँ बुला लो!!
मधु: मेरी माँ पुराने ख्यालों की है बेटी के घर नहीं आएगी। भाभी को भी अच्छा नहीं लगेगा कि माँ मेरी मदद करने आए, क्योंकि मुन्ने को वही रखती हैं। भाभी ने मुन्ने को जन्म जरूर दिया है किन्तु पालन-पोषण की जिम्मेदारी माँ की ही है!!
रमन: मधु! लेकिन तुम्हारे प्रसव के लिए कोई न कोई व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी, वह भी जल्दी, क्योंकि 8वाँ महीना बीत चुका है कभी भी प्रसव पीड़ा की शुरुआत हो सकती है!!
मधु: रमन क्यों न तुम अपनी माँ से बात करो कि वे यहाँ आ जाएं या मैं उनके पास चली जाऊँ??
रमन: नहीं! मधु तुम जानती हो माँ ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया है। न तो वे यहाँ आएंगी और न ही हमारी कोई मदद करेंगी! पिता की मृत्यु किन हालातों में हुई?? वे नहीं भूली हैं। उन्हें मुझसे कोई लगाव नहीं!!
मधु: तुम एक बार बात तो करो!!
रमन: नहीं! जब मैं जवाब जानता हूँ फिर बात कैसे करूँ!!
मधु: मेरी गलती की सजा आखिर तुम्हें कब तक मिलती रहेगी, माँ मुझे कभी माफ भी करेंगी या नही, मैं माँ से बात करूँ??
रमन: तुम्हारी मर्जी!!
मधु:(सासु माँ को फोन लगाते हुए) माँ! माँ! मुझे माफ कर दीजिए, आप कब तक हमसे नाराज रहेंगी?? मैं प्रसव के लिए आपके पास आ रही हूँ या आप यहाँ आ जाइए!!
सासु माँ: नहीं! मधु मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकती! आगे से मुझे कभी फोन मत करना!! इतना कहकर उन्होंने मधु का जवाब सुने बिना ही फोन काट दिया!!

सात साल हो गए लगता है कल ही की बात है!
रमन ने बीए पास करते की कम्पनी में जाॅब शुरु कर दिया! कुछ दिन बाद ही मधु के चाचा दिल्ली में रहने वाले अपने बड़े भाई की बेटी मधु का रिश्ता गोविंदजी और गीता जी की इकलौती संतान रमन के लिए लेकर आए। माता-पिता और रमन ने लड़की देखी जो ठीक-ठाक थी सम्बन्ध पक्का हो गया। साधारण तरीके से बिना दहेज विवाह सम्पन हो गया। 
मधु ससुराल आ गई। रमन के पिता हाल ही में अध्यापक पद से रिटायर हुए थे, माँ के रिटायर होने में दो वर्ष शेष थे वह भी शिक्षिका थी। सम्पन्न परिवार था किन्तु दिल्ली में रहने वाली मधु आजाद ख्यालों की थी। वह सास ससुर की बंदिश में रहना नहीं चाहती थी इसलिए उसने रमन पर दिल्ली में जाॅब करने का दबाव बनाया। रमन ने अपने माता-पिता को छोड़कर दिल्ली जाने से साफ इन्कार कर दिया। इससे मधु बुरी तरह तिलमिला गई। उसने दिल्ली फैमिली कोर्ट में सास ससुर एवं रमन पर दहेज के लिए मारपीट और ससुर पर तो छेड़छाड़ का भी केस लगा दिया। तीनों को जेल जाना पड़ा। बहुत बदनामी हुई। 
ससुर इस सदमे को सहन नही कर पाए उन्होंने दम तोड़ दिया!
मधु से पीछा छुड़ाने के लिए गीता जी ने एक मुश्त रकम 3000000/- जो कि मधु तलाक देने के एवज में मांग रही थी, कोर्ट में जमा करा दी। दोनों का तलाक हो गया। 
तलाक के 6 महीने के अंदर ही रमन की रेलवे में सरकारी जाॅब लग गई। रमन दूसरे शहर में रेलवे क्वार्टर में रहने चला गया।
रमन के लिए रिश्तों की लाइन लग गई। 
मधु को भी रमन की नौकरी की भनक लग चुकी थी वह रमन से सम्पर्क साधने लगी।
जब रमन ने उसके सम्पर्क का कोई जवाब नहीं दिया तो एक दिन वह रमन के रेलवे क्वार्टर में आ धमकी और उसके पैरों पर गिर कर माफी मांगने लगी।
रमन मुझे माफ कर दो मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। 3000000/- वापस लेलो लेकिन मुझे माफ कर दो। आसपास रहने वाले लोग इकट्ठे हो गए। 
रमन को चुप देख कर बोली, "जब तक तुम मुझे माफ नहीं करोगे, मैं यहाँ से नहीं जाऊंगी!"
रमन बोला, "माफ कर दिया जाओ यहाँ से।"
मधु चली गई और रमन को बार-बार फोन करने लगी। रमन ने उसके किसी फोन का जबाव नहीं दिया।
वह फिर से रमन के पास आ धमकी और उस पर फिर से शादी करने का दबाव बनाने लगी। रमन ने मना कर दिया तो उसने कुएं में पैर लटका लिए और बोली, "अगर तुमने शादी के लिए हाँ नहीं की तो 
मैं कुएं में कूदकर जान दे दूंगी।"
भावुक रमन उसके कहे को सच मानकर बातों में आ गया और हाँ कर दी!
मधु ने पूछा,"कब करोगे शादी??"
रमन बोला, "माँ से बात करके बताऊँगा।"
जल्दी बताना कहकर मधु चली गई!!
मधु ने रमन को फोन करने का प्रयास किया, किन्तु रमन ने फोन नहीं उठाया!!
मधु एक महीने बाद फिर आ गई।
मधु: तुम मेरा फोन क्यों नहीं उठाते??
रमन ने कोई जवाब नहीं दिया!!
मधु: अभी मुझसे शादी करो, वर्ना मैं सबके सामने अभी जान दे देती हूँ!! 
रमन घबरा गया। माँ को फोन लगा कर सारी स्थिति से अवगत कराया।
माँ ने कहा, "मैं पुलिस को फोन कर रही हूँ, तू उससे कह कि तू उससे शादी नहीं करेगा!!"
रमन डरते-डरते बोला, "माँ!! वह मर गई तो मुझे जेल जाना पड़ेगा!"
माँ: "कुछ नहीं होगा, वो तुझे पागल बना रही है!!"
रमन: "नहीं माँ! वह सच में मर जाएगी।
दृढ़निश्चय चेहरे पर दिख रहा है!!"
माँ: मेरी बात समझ कुछ नहीं होगा, तू उसकी फिक्र क्यों कर रहा है?? 
उसने हम सबके साथ जो किया है उसे मत भूल!! तेरे पिता की जान चली गई!!"
रमन: इसके लिए उसे बहुत पछतावा है उसने माफी मांग ली है!!
माँ: बेटा! कुछ गुनाहों की माफी नहीं होती!!
रमन: माँ कितना खींचेगें, जो हो गया उसे भूल जाइए। शादी तो किसी न किसी से करनी ही है। मधु अपने किए पर बहुत शर्मिन्दा है। हमें उसके (मधु ने रमन के हाथ से फोन ले लिया) माँ मुझे माफ कर दीजिए, मैं आपकी गुनहगार हूँ!!
मधु की आवाज सुनते ही गीता जी ने फोन काट दिया!! मधु समझ गई कि सासु माँ नहीं मानने वाली। 
मधु रमन पर शादी का और अधिक दबाव बनाने लगी। वह इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी, वह जानती थी कि रमन उसके झांसे में आ चुका है, सासु माँ कभी तैयार होगी नहीं!! 
उसने रमन से कहा, "अन्य लड़की से तुम्हारी शादी हुई, उसे तो मैं नहीं होने दूंगी। उसी पल जान दे दूंगी। फिर उलझते रहना पुलिस से।
भावुक रमन मधु के पैंतरों के सामने कितना टिकता??"
रमन ने माँ को फोन लगा दिया, "माँ मेरी शादी ये किसी से होने नहीं देगी, अगर हो भी गई तो चैन से जीने नहीं देगी, इससे बेहतर है कि इससे ही शादी कर लेता हूँ
फालतू के झंझटों से तो बच जाऊँगा!!"
माँ: ठीक है बेटा शादी करने से पहले अपनी माँ की मौत का शोक मना कर चिता को आग दे देना!!"
ये कहकर गीता जी ने फोन काट दिया।
रमन ने माँ को बार-बार फोन लगाया किन्तु माँ ने फोन नहीं उठाया। रमन ने सोचा माँ कितने दिन नाराज रहेगी, मना ही लूंगा।
मधु इस मौके को गंवाना नहीं चाहती थी उसी शाम मंदिर में दोनों ने शादी कर ली।
दूसरे दिन सुबह दोनों माँ से मिलने निकल पड़े। घर पहुंच कर रमन ने घंटी बजाई।
माँ ने दरवाजा खोला सामने रमन और मधु को देखकर भौंचक्की रह गई। रमन और मधु पैरों पर झुके तब उसकी तंद्रा भंग हुई उसने पैर पीछे खींच लिए। 
रमन से बोली, "उल्टे पैर वापस लौट जा मैं तेरी शक्ल देखना नहीं चाहती।
तू अपने पिता का अपमान और मौत भूल चुका है। मैं नहीं भूल सकती लेकिन तेरे इस कारनामे के बाद तुझे जरूर भूल सकती हूँ! जिंदगी में कभी मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना। हम दोनों एक-दूजे के लिए मर गए!!" इतना कहकर गीता जी ने दरवाजा बन्द कर लिया। बेटा माफी मांगता रहा, दरवाजा खोलने का आग्रह करता रहा किन्तु गीता जी ने दरवाजा नहीं खोला। रमन और मधु वापस चले गए। 5 वर्ष हो गए गीता जी ने रमन से कोई सम्पर्क नहीं किया न ही रमन का कोई फोन उठाया।
गीता जी ने 300 वर्ग फुट के मकान को वृद्धाश्रम के लिए दान कर दिया जितनी भी जमा पूंजी थी उसका एक ट्रस्ट बना दिया जो कि वृद्धाश्रम के बुजुर्गों पर खर्च होगी। मधु ने सास-ससुर की प्रोपर्टी और जमा पूंजी को पाने के लिए बहुत हाथ पैर मारे किन्तु कामयाब नहीं हो पाई।
मधु को 3 वर्ष की एक बेटी है, उसका दुबारा प्रसव होने वाला है।
किसी तरह मधु ने अपनी मां को प्रसव के लिए अपने पास बुला लिया। 
प्रसव होने के बाद मधु की माँ ने गीता जी को फोन किया, कहा, "बहिन जी मधु ने आपके पोते को जन्म दिया है, गुस्सा थूक दीजिए, गले लगा लीजिए!"
गीता जी: "जब बेटा ही नहीं है तो पोता कहाँ से आ गया??" कहते हुए गीता जी ने फोन काट दिया!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)


शराब

सुनो भैया! "तुम्हारा मिट्टी का तेल फैल गया! तुमने बक्से के पीछे रख दिया, हमें तो पता ही नहीं चला इसलिए ध्यान नहीं गया, गिरकर फैल गया तब ही मालूम हुआ!!"

सिपाही बोला, "कोई बात नहीं मैडम! कोई बात नहीं! फैल जाने दो!! फैल जाने दो!!"

मैडम बोली, "कब-कब का इकट्ठा कर के रख लिया है, बहुत बदबू मार रहा है??"

पुलिस वाले गर्दन नीची करके मुस्कुराने लगे, कोई कुछ न बोला!!

अध्यापिकाएँ चलीं गईं!!

राजस्थान में 5वीं की परीक्षा बोर्ड की होती है।
परीक्षा के दौरान परीक्षा प्रश्नपत्रों को कड़ी सुरक्षा में रखा जाता है।
जिस दिन परीक्षा होती है उस दिन उसी विषय के प्रश्नपत्र परीक्षा होने से आधा घण्टा पहले अध्यापक सुरक्षित स्थान से विद्यालय ले आता है!!

ये सुरक्षित स्थान विद्यालय के आस-पास का कोई थाना या पुलिस चौकी होती है।

विद्यालय के पास ही पुलिस चौकी में तीन विद्यालयों के परीक्षा प्रश्नपत्र रखे गए। पुलिस वालों ने एक मध्यम आकार का बक्सा उपलब्ध करा दिया। परीक्षा वाले दिन दो अध्यापिकाएँ परीक्षा प्रश्नपत्र लेने गईं, उन्होंने बक्सा खोला तो बक्से के बगल में दो शराब की बोतलें रखी हुई थी, उनमें से एक बोतल गिर कर टूट गई, उसमें से शराब फैल कर बहने लगी। कमरे में तीव्र बदबू फैल गई। महिला अध्यापिकाएँ बाहर आईं। पुलिस वालों को बताया कि मिट्टी का तेल फैल गया है और चली गईं!! 

पुलिस वाले मुश्किल से अपनी हंसी रोके बैठे थे।
अध्यापिकाओं के जाते ही ठहाका लगा कर हंसने लगे! मिट्टी का तेल!! हा..हा..हा..हा...!!

एक बोला, "उन्हें क्या मालूम कि ये दारू है वे तो इसे सड़ा हुआ मिट्टी का तेल समझ रही थीं!!
कहकर जोर-जोर से हंसने लगा हा..हा..हा..हा..!!

दूसरा बोला, "हो सकता है वह समझ गईं हों कि ये शराब की बोतलें हैं। लेकिन वे हमसे कहतीं कैसे कि शराब की बोतल फूट गई है और वही बदबू फैल गई है जिसे हम पीते हैं!!"

उसकी बात सुनकर सब चुप हो गए!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)



सजगता

6 वर्षीय बेटा रोता हुआ दादी की गोद में जा बैठा!!
मेरी चप्पल नहीं मिल रही बाहर बारिश हो रही है पैर गीले हो जाएंगे, बाहर कैसे जाऊ???

दादी ने आवाज लगाई, "बहू! बहू!"

बहू दौड़कर आई, "जी कहिए।"

छोरे की चप्पल नही मिल रही। ढूँढ कर देदे।।

बहू: "माँ जी चाय गैस पर रखी है। इससे कहिए अपनी चप्पल खुद ढूँढ़ कर लाएगा। हर बात के लिए रोकर आपकी गोद में बैठ जाता है।"

इतना कहकर बहू चली गई।

बच्चा जोर से रोने लगा!

दादी ने बच्चे को गोद में उठाया और चप्पल ढूँढ़ने चल दीं। बाहर कदम रखते ही गीली मिट्टी में फिसल गई। दादी-पोता दोनों गिर कर मिट्टी सें सन गए।
कच्चा होने की वजह से दोनों को चोट नहीं लगी।

अक्सर ये हमें घरों में देखने को मिल सकता है अगर दादी-दादा साथ में रहते हैं तो बच्चे अक्सर उनसे अपनी जिद पूरी कराते रहते हैं जो कि माता-पिता नहीं करते। इसमें बुराई नहीं है लेकिन एक दायरे की आवश्यकता है वर्ना अत्यधिक लाड-प्यार दुखदाई हो सकता है। 

जैसे दादी 6 साल के बच्चे को गोद में उठाकर चल दी। अगर बच्चे से चप्पल ढूँढ़ने के लिए कहा गया होता तो दोनों नहीं गिरते!!

इसी प्रकार माता-पिता से छिपा कर दादा-दादी द्वारा पैसे देना, गलत हरकत पर पर्दा डालना, कि इसे कहीं डांट न पड़ जाए इत्यादि शामिल है। इसका परिणाम सामने आता है तो बहुत देर हो चुकी होती है।

कभी-कभी ये काम माता-पिता भी करते हैं। बच्चों की हर इच्छा पूरी करते हैं लेकिन वे क्या कर रहे हैं इस को नजरंदाज कर जाते हैं। जो कि दुखद परिणाम के रूप में सामने आ सकता है। हमें बच्चों को लेकर सजग रहना चाहिए।

अक्सर बच्चों पर नज़र रखनी चाहिए।
🙏🙏

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 



बाल मेला

मोनू छठी कक्षा का छात्र था। उसके विद्यालय में 14 नवम्बर बाल दिवस के दिन बाल मेला का आयोजन होने वाला था। अध्यापिका ने सब बच्चों को एक हफ्ते पहले ही जानकारी दे दी इस बार छठी एवं सातवीं कक्षा के विद्यार्थी दुकानदार बनेंगे बाकी कक्षाओं के बच्चे ग्राहक। बच्चों को क्या करना है यह निर्णय छात्रों पर ही छोड़ दिया। छात्र योजना बनाने लगे। खिलौने की दुकान, टाॅफी की दुकान, गुब्बारे पर निशाना, रिंग से निशाना लगाना इत्यादि इसी तरह बहुत कुछ। बच्चे उत्साह के साथ सोचने लगे।

मोनू और राजू ने योजना बनाई कि उस दिन हम दोनों चाट-पकौड़ी, पानी की टिक्की की दुकान लगाएंगे बहुत मजा आएगा। दोनों बहुत खुश थे उत्साहित होकर तैयारी में लग गए।

मेले से एक दिन पहले राजू बीमार पड़ गया। मोनू बहुत उदास हो गया कि अब वह अपनी दुकान नहीं लगा पाएगा। मां ने बहुत समझाया, "कोई बात नहीं अगले वर्ष कर लेना, विद्यालय में मेले का आयोजन तो हर वर्ष होता है।"

किन्तु मोनू की उदासी समाप्त नहीं हुई, उसे लगा कि उसकी कक्षा के सब बच्चे कुछ-न-कुछ करेंगे, वह उन्हें देखता ही रह जाएगा।

यही सोचते-सोचते वह सो गया सुबह मम्मी ने प्यार से उठाया, "आज विद्यालय में कार्यक्रम है तुझे जाना नहीं है अभी तक सो रहा है!!"

मोनू: आराम से चला जाऊँगा मुझे कौनसा कुछ करना है?? मेरी तो दुकान ही नहीं है।"

तभी उसका भाई कवि जो आठवीं कक्षा का छात्र था उसके सामने आ गया, "तेरा दोस्त कम भाई हाजिर है, हम भी मेले में शामिल होंगे। तेरे लिए सरप्राइज है! चल जल्दी तैयार हो जा।"

मोनू: "हमारी कोई तैयारी नहीं है भैया, कहाँ है सामान हम किस चीज की दुकान लगाएंगे??"

कवि: "तू तैयार होकर नीचे आ सब तैयार है।"
मोनू खुश होकर अपने भाई से लिपट गया, "सच भैया।" 

मोनू शीघ्र ही तैयार होकर नीचे आ गया, उसने देखा उसका भाई एक पोटली उठाकर टैम्पो में रख रहा है मोनू को देखते ही बोला, "आ जल्दी बैठ।"

मोनू बगल में आकर बैठ गया, "भैया इसमें क्या है बताओ तो सही, हम किस चीज की दुकान लगाएंगे??"

कवि: "तुझे स्कूल जाकर ही पता चलेगा।"

दोनों स्कूल पहुँचे। कवि ने बड़ी सी मेज ली उसे पर्दे से कवर कर दिया, मोनू उसे आश्चर्य से देख रहा था कि भाई क्या कर रहा है??

उसका भाई बोला, "क्या देख रहा है, पर्दे लगाने में मदद कर।"

मोनू भाई की मदद करने लगा। झोले में से कवि ने कठपुतलियाँ निकाली, उन्हें डोरी की सहायता से पर्दे पर नचाने के लिए तैयार करने लगा।

कठपुतलियाँ देखकर मोनू खुश हो गया, कवि से बोला, हम कठपुतलियाँ नचाएंगे, बहुत मजा आएगा। हमारा खेल सबसे हटकर होगा!

कवि ने उसकी तरफ मुस्करा कर देखा, "हाँ मोनू।"

गीत गा-गाकर दोनों भाई कठपुतलियाँ नचाने लगे।
उन्होंने मेले की रौनक बढ़ा दी। शाम तक दोनों भाई बच्चों का मनोरंजन करते रहे हालांकि उन्हें कोई इन्कम नहीं हुई किन्तु बच्चों की तालियाँ और खिल खिलाते हुए चेहरे बहुत आनंदित कर रहे थे। कक्षा अध्यापक बार-बार उनका उत्साहवर्धन करने आ रहे थे, "तुम बहुत अच्छा और अलग हटकर कर रहे हो।"

शाम 5 बजे मेले का समापन हुआ। दोनों हंसते खिलखिलाते घर आए।

मोनू की खुशी का तो पारावार ही नहीं था वह चहक चहक कर मम्मी को अपने द्वारा किए गए कार्यों को बता रहा था।

दूसरे दिन विद्यालय में सर्वोत्कृष्ट दुकान या गतिविधि को प्रथम घोषित कर इनाम दिया जाना था।

प्रथम स्थान के लिए मोनू का नाम पुकारा गया। मोनू को तो अपने कानों पर भरोसा ही न हुआ। वह स्टेज पर पहुँचा और इनाम की ट्राॅफी को प्राप्त किया। साथ ही उसने सभी को अवगत कराया कि उसका दोस्त बीमार हो गया इसलिए उसे मेले में शामिल होने की उम्मीद ही नहीं थी। लेकिन उसके भाई कवि ने उसकी मदद की। इसलिए कृपया उसे भी स्टेज पर बुलाया जाए। उसके भाई को स्टेज पर बुलाया गया तो मोनू ने ट्राॅफी उसके हाथ में दे दी।
दोनों भाइयों ने एक साथ ट्राॅफी प्रदाता के पैर छुए,
पूरा हाॅल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 

देवर का बेटा

ताऊ जी ने अपने इकलौते बेटे की शादी बड़ी धूमधाम से की। बहू बहुत तेज-तर्रार थी, ताई जी के साथ अक्सर उसका झगड़ा होता। घर में कलह का वातावरण बना ही रहता। 

कुछ दिन बाद अचानक हृदय गति रुकने से ताऊजी का देहांत हो गया। ताई जी के लिए समस्या और बढ़ गई। पति के जाने के बाद बहू का व्यवहार अधिक कटु हो गया, वह बात-बात पर जहर उगलने लगी। सास-बहू का झगड़ा छोटी-मोटी बात पर होता ही रहता। 

ताई जी इस कलह से तंग आकर अपने देवर के बेटे के यहाँ चली गईं, फिर वह मरते दम तक न लौटी।
देवर के बेटे के यहाँ उन्हें मान-सम्मान मिला। बुढ़ापा अच्छे से कट गया। 

उनकी एक आदत थी कि वह खाने-पीने की चीजें तीन-चार दिन तक रखती, उन्हें कूट-पीस कर खाती रहती। देवर का बेटा और बहू उन्हें बहुत समझाते कि तुम्हें जब भी खाना हो कहो हम तुम्हें ताजा खिलाएंगे। 

वह आदत से मजबूर मानती ही नहीं थी। 
मकर संक्राति पर देवर के बेटे की बहू ने उन्हें संकल्प करके टिकिया, मंगोड़ी, तिल लड्डू इत्यादि खाने की चीजें दीं। 

उन्होंने पेट भर खाया और बची हुई सामग्री बाद में खाने के लिए एक कपड़े में बाँध कर चक्की के ऊपर रख दी।

खा-पीकर खाट पर लेट आराम करने लगी। एक कुत्ता निगाह बचाकर कब अंदर घुस गया पता ही न चला, जब वह खाद्य सामग्री की पोटली लेकर बाहर निकला तब ताई जी की नज़र पड़ी कि कुत्ता उनका नाश्ता ले जा रहा है।

वे कुत्ते के पीछे डण्डा लेकर चिल्लाते हुए भागी।

हाय! कुत्ता मेरा नाश्ता ले जा रहा है....
हाय! कुत्ता मेरा नाश्ता ले जा रहा है....

आगे-आगे कुत्ता पीछे-पीछे ताईजी! 

जब कुत्ता आँखों से ओझल हो गया तब वापस लौटी।

बहू ने समझाया क्या जरूरत थी कुत्ते के पीछे भागने की। ले गया तो ले जाने देती और बन जाएगा!!

लेकिन वे कहाँ समझने वाली थी बच्चों की तरह हरकतें करती ही रहती!!

बीमार पड़ी तो फिर उठ न सकीं। इलाज भी कराया किन्तु बुढ़ापे का कोई इलाज नहीं होता। एक महीने खटिया पर पड़े रहने के बाद वे भगवान के घर चली
गई।

उनकी मौत की खबर सुनकर भी उनकी बहू नहीं सिर्फ बेटा आया। बेटे से दाह-संस्कार करने के लिए कहा तो उसने कहा कि वह 13 दिन नहीं रुक पाएगा इसलिए दाग नहीं दे सकता। देवर के बेटे ने ही दाह-संस्कार का फ़र्ज निभाया!!

जैसी जिसकी नियति!!
वैसे भी मरने के बाद कौन देखता है कि चिता को आग खुद का बेटा लगा रहा है या देवर का बेटा!!
So Sad 😞😔 

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)


टिप्पणी

एक प्रौढ़ व्यक्ति किसी भी लड़की को अकेले देखते तुरंत उसके पीछे चल देते। अपनी उम्र का लिहाज न करते हुए भद्दी टिप्पणी शुरू कर देते। लड़कियों को बड़ा अजीब लगता है, उनकी तरफ देखती और बड़बड़ाती, गाली देती हुई चली जाती!! बुड्डे को लड़की की इस हरकत पर बड़ा मजा आता! वे खड़े-खडे हँसते रहते और लड़की को जाते हुए देखते रहते जब तक कि वह ओझल न हो जाए।

एक दिन उन्होंने एक लड़की देखी और हो लिए उसके पीछे, जवान चलने लगी- चल आजा, मेरे साथ चल, थोड़ा सा काम है, तुझे पैसे भी दूंगा,
अरे चल न कितनी देर से कहे जा रहूँ, तू जितने पैसे चाहेगी, उतने दे दूंगा। 
लड़की ने पीछे मुड़कर नहीं देखा, सुनती रही वे कहते रहे। बोल कितने रुपये लेगी?? सुनते ही लड़की पलटी, चलिए मामाजी कहाँ ले जाना है, मैं तैयार हूँ!! 
सामने भांजी को देखकर मामाजी के हाथ-पांव फूल गए क्योंकि भांजी को पीछे से वे पहचान नहीं पाए।  

भांजी को देखते ही उनसे कुछ कहते न बना, वे बोले, "मैंने तुझे पहचान लिया था, मैं तो तुझसे मजाक कर रहा था।"

लड़की: हाँ मामाजी मैं आपके मजाक को बहुत अच्छी तरह समझती हूँ। मैंने आपकी हरकत के बारे में सुन रखा था लेकिन मैंने भरोसा नहीं किया। पर आज नमूना देख लिया। मुझे बहुत बुरा लग रहा है, "आप मेरे मामा हैं। थू है तुम जैसे घटिया आदमी पर, जिसे अपनी उम्र का भी लिहाज नहीं। तुम जैसे लोगों की गंदगी का इल्ज़ाम युवा वर्ग पर लगता है किन्तु अश्लीलता तुम फैलाते हो!
अरे नहीं लाली तू ग़लत......

लड़की चली गई....

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 

चीख

चीख की आवाज सुन कर लोग इकट्ठे हो गए।
लोगों की बातचीत शुरू हो गई......
एक: अरे! क्या हुआ?? कैसी चीख पुकार है??
दूसरा: बाबू को कुत्ता खा गया!
तीसरा: कैसै??
कोई एक: कानूनगो साहब के चबूतरे पर सो रहा था। मुँह तक चादर ओढ़ रखी थी, कुत्ते ने चादर के ऊपर से ही नाक पर से मांस खींचकर बुरी तरह घायल कर दिया है।
कोई दूसरा: बेचारा! घर में जगह नहीं है दूसरे के दरवाजे पर सोना पड़ता है।
जबसे भाई की शादी हुई है। बेचारे का घर निकाला हो गया।
बाबू के घर वाले आ गए। बाबू की माँ ने कपड़े से खून साफ कर लाल मिर्च पाउडर भर दिया।
बाबू बुरी तरह तड़पने लगा, डकराने लगा।
किसी ने कहा: अस्पताल ले जाओ!
पिता ने कहा, "सुबह ले जाएंगे!!"

भीड़ छंट गई, सब अपने-अपने घरों में घुस गए। 
माता-पिता भी चले गए। 

बाबू सिसकता रहा। पास ही उसका एक साथी बैठा रहा। उसे सांत्वना देता रहा। सुबह अस्पताल चलेंगे, तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा। 

उसका साथी बातों से बाबू का ध्यान बंटाकर दर्द कम करने का प्रयास कर रहा था।

साथी: "बाबू एक बात बता, क्या तुझे पता नहीं चला, कि कुत्ता है! कोई आहट नहीं हुई??"

बाबू: "आहट तो हुई थी, लेकिन मैंने समझा कि ठकुराइन वापस जा रही है। इसलिए मैंने चादर नहीं हटाई। मैं तो जाग रहा था। उसके भ्रम में कुत्ते का शिकार हो गया।"
सन् 80 के दशक का वाकया है। 

ठकुराइन सामने के घर की औरत थी, उसके तीन बेटे थे। बड़ा बेटा लगभग 16-17 साल का, दो उससे एक एक साल छोटे। ठकुराइन का पति ट्रक ड्राइवर जो अक्सर घर से बाहर रहता। 

कानूनगो लगभग 50-55 वर्षीय रिटायर्मेंट के नज़दीक गोरखपुर के रहने वाले थे। इकलौता बेटा और पत्नी गोरखपुर में रहते थे। वे कभी-कभार कानूनगो से मिलने आते। कानूनगो का गोरखपुर जाना कम ही हो पाता। एक-दो दिन की छुट्टी में घर जाते नहीं थे, लम्बी छुट्टी लेने का प्रयास नहीं किया। एक गाय पाल रखी थी, बाहर जाते तो उसकी देखभाल के लिए किसी व्यक्ति को रख कर जाते और दो एक दिन में वापस आ जाते। पति-पत्नी से दूर रहने वाले ठकुराइन और कानूनगो एक-दूसरे के करीब आ गए। ठकुराइन को पैसे की दरकार और कानूनगो पर पैसे की कमी नहीं।

ठकुराइन रात को अपने घर का दरवाजा खोलती और चुपके से कानूनगो के घर में घुस जाती।
उन दोनों के सम्बन्ध को लेकर मौहल्ले में कानाफूसी जोरों पर थी, शायद ही कोई हो जिन्हें उन दोनों के बारे में पता नहीं हो। कानूनगो मुहल्ले में सबके साथ अच्छा व्यवहार रखते और जरूरत मंद को कर्जा भी देते रहते। इसलिए मौहल्ले के लोग उनकी करतूत को नजरंदाज करते। यही वजह थी कि बाबू उनके घर के आगे चबूतरे पर सो जाता, लेकिन वह उनकी ही करतूत की वजह से कुत्ते का शिकार हो गया।

दूसरे दिन बाबू अपने दोस्त के साथ अस्पताल गया। वहाँ कुत्ते के काटने पर लगने वाला इंजेक्शन एंटी रैबीज उपलब्ध नहीं हो पाया। स्वयं के पैसे से इंजेक्शन खरीद कर लगवाने की बाबू की हैसियत नहीं थी।

दिन पर दिन बाबू की तबियत खराब होने लगी लेकिन इंजेक्शन की व्यवस्था नहीं हो पाई। 
देशी इलाज, झाड़-फूंक, कुंड पर ले जाकर नहलाया भी गया, लेकिन सब बेकार!!

कुछ दिनों की असीम पीड़ा झेलकर बाबू ने कुत्ते की तरह भोंक-भोंक कर तड़पते हुए दम तोड़ दिया।
इस दुनिया में इंसान की जिंदगी बहुत सस्ती है!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 



साइकिल

80 के दशक की बात है, कविता 12वीं कक्षा की छात्रा थी। साइकिल से स्कूल जाती। स्कूल करीबन 3 किलोमीटर दूर था। वह वालीबॉल प्लेयर थी, इसलिए स्कूल में वालीबॉल का अभ्यास करके ही शाम को घर जाती। सर्दियों के दिन थे। पाँच बजे ही अंधेरा घिरने लगा। निश्चिंत थी कि घर पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा किन्तु थोड़ा सा चलते ही साइकिल की चैन टूट गई। वह बहुत डर गई। आसपास सुनसान। लम्बा रास्ता साईकिल को घसीटते हुए कैसे तय करे?? अंधेरा बढ़ने के साथ-साथ घबराहट भी बढ़ रही थी! इक्का-दुक्का लोग निकल रहे थे किससे मदद मांगे?? 

दो लड़के साइकिल पर आते दिखे उसने अपनी रफ्तार तेज करदी, लेकिन वे साइकिल पर और वह पैदल, शीघ्र ही वे नजदीक आ गए, साइकिल की रफ्तार भी कम कर ली, डर के मारे उसके हाथ-पांव फूलने लगे!!

एक लड़का बोला, "क्या हुआ??"
दूसरा, "पैदल क्यों जा रही हो??"
:हम कुछ मदद करें क्या??"
कविता के मुँह से कोई आवाज नहीं निकली!

तभी उसकी नज़र पुलिस लाइन पर पड़ी। घबराहट के मारे उसने अपने कदम पुलिस लाइन की ओर मोड़ लिए। साइकिल घसीटते हुए पुलिस लाइन में प्रवेश कर गई। पहला घर दिखा उसी का दरवाजा खटखटा दिया! 

लेकिन ये क्या!! दोनों लड़के भी पुलिस लाइन की ओर ही आ गए। बिना कुछ बोले उसके पास आके खड़े हो गए। उन्हें अपने नजदीक देख कर घबराहट और बढ़ गई। 

कविता: (डरते हुए) "तुम मेरा पीछा कर रहे हो??"
लड़के: नहीं! नहीं!

तभी दरवाजा खुला।

लगभग 18-20 साल के लड़के ने दरवाजा खोला, कविता की ओर देख कर बोला, "कहिए किससे मिलना है??"

कविता: (भरी सर्दी में पसीने से तर-बतर घबराते हुए) "मेरी साइकिल की चैन टूट गई है, ये लड़के मेरा पीछा करते हुए यहाँ तक आ गए हैं।"

लड़का उनको देख कर हँसा! 

उसने अपनी माँ को आवाज दी। उसकी माँ और बहन दोनों बाहर आईं, कविता को अंदर ले जाकर बिठाया और पानी पिलाया।

लड़के की माँ ने बताया, "ये मेरा छोटा बेटा है, तुम्हारा पीछा करते हुए नहीं आया ये उसका घर है।
थोड़ा आगे जाकर दूसरा लड़का, जो इसका दोस्त है, उसका घर है। अपने बेटे की तरफ देखकर व्यंग्य से हंसते हुए, मेरा बेटा लोफर तो नहीं लगता पता नहीं तुमने कैसे इसे लोफर समझ लिया??

माँ की बात सुनकर उसकी बहन भी हंसने लगी।

मेरी तरफ मुखातिब होकर, "तुम अपनी साइकिल यहीं छोड़ दो मेरा छोटा बेटा कल ठीक करा देगा। तुम्हारे माता-पिता परेशान हो रहे होंगे, मेरा बेटा और बेटी तुम्हें घर छोड़ देंगे।"

कविता बाइक पर बैठकर उनके बेटा और बेटी के साथ अपने घर पहुंची। उसके घरवाले उसके लिए बहुत चिंतित थे। उसके पिता और भाई उसे ढूँढ़ने के लिए घर से बाहर आ गए थे, बाइक की आवाज सुन कर रुके। कविता को देखा तो उनकी जान में जान आई।

कविता की आपबीती सुनकर परिवार वाले उनका धन्यवाद देते नहीं थक रह थे। बार-बार मनुहार करके उन्हें चाय नाश्ता कराया। आगे भी आते रहने का आग्रह किया।

दूसरे दिन कविता ने अपनी साइकिल उनके यहाँ से उठाई, जो कि ठीक करा कर रखी गई थी। उसे जबरदस्ती खाना भी खिला दिया, कहा, "कल तो तुम जल्दी में थी इसलिए हमने तुम्हें नहीं रोका।"

उनकी बेटी उसकी अच्छी दोस्त बन गई। दोनों घरों में आना-जाना होने लगा। वे अक्सर बाहर घूमने साथ जाते। ये आना-जाना इतना बढ़ गया कि आज वह घर कविता का ससुराल है। पहली बार कविता जिसकी बाइक पर बैठी, वही उसका पति है। वे दोनों कब इतने करीब आ गए पता ही न चला। दोनों परिवारों को कोई आपत्ति नहीं थी, उनकी शादी हो गई। आज कविता दो बेटों की माँ है। सास-ससुर की लाड़ली बहु है। वह अपने परिवार में बहुत खुश हूँ। ईश्वर की बड़ी कृपा है।
धन्यवाद 🙏🙏

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)

शव बदल गया

कुछ समय पूर्व की ही बात है एक बड़े हादसे में कई लोग घायल हुए और दो लोगों की मौत भी हुई। दोनों शवों को पोस्टमार्टम के पश्चात मोर्चरी में रखवा दिया गया। 

एक शव का चेहरा कुचलने के कारण पहचान में नहीं आ रहा था। जब उसके परिजन बाॅडी लेने आए तो गलती से दूसरा शव (जो उनका परिजन नहीं था और चेहरा भी सही सलामत था) उनके हवाले कर दिया। परिजनों ने चेहरा देखने की जहमत नहीं उठाई क्योंकि उनके मुताबिक कुचलने की वजह से चेहरे की पहचान नहीं हो पाएगी।
पोस्टमार्टम के पश्चात जैसी बॉडी उन्हें प्राप्त हुई, उन्होंने उसका दाह संस्कार कर दिया।

दूसरे शव के परिजन डैडबॉडी लेने आए तो स्वाभाविक था कि उसकी पहचान करेंगे, क्योंकि वह अपने परिजन के शव को पहचानते थे। पोस्टमार्टम से पहले उसकी शिनाख्त कर चुके थे।
उन्होंने जैसे ही शव का कुचला चेहरा देखा तो सन्न
रह गए, ये उनके परिजन का शव नहीं था। 
'ये हमारा व्यक्ति नहीं है' चीख चिल्लाहट शुरू हो गई। 
तैनात पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। उनको समझ में आ गया कि बहुत बड़ी गलती हो गई है।
परिजनों को शान्त करने का प्रयास किया गया किन्तु वे तो आपे से बाहर थे क्योंकि उनके परिजन के शव का दाह-संस्कार तो कोई अन्य परिवार कर चुका था। सामने पड़ी हुई डैडबॉडी उनके परिजन की नहीं थी, दाह-संस्कार का तो सवाल ही नहीं था। 

हड़कंप मच गया। पूरा प्रशासन इकट्ठा हो गया।
एक एसआई दो कांस्टेबल तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिए गए, क्योंकि डैडबॉडी उन्हीं के प्रभुत्व में थी और उन्हीं के द्वारा परिजनों के सुपुर्द की गई थी।

डैडबाॅडी के असली परिजनों को बुलाया गया। उन्हें यथास्थिति से अवगत कराया गया। उन्हें भी बड़ा ताज्जुब हुआ कि वे किसी अन्य शव का दाह-संस्कार कर चुके हैं। और उनके परिजन का शव अभी तक मोर्चरी में ही पड़ा है।

तीन दिन तक मामला बहुत गर्माता रहा। क्या होगा?? हर किसी को यही जिज्ञासा थी!!

प्रशासन के दखल एवं गाँव की समझाइश से तीन दिन बाद मामला शांत हुआ कि जो हो चुका है वह तो वापस नहीं आ सकता!! दोनों परिवार आपसी समझौते से काम लें और मिलकर दाह-संस्कार कर दें। प्रशासन की उपस्थिति में दोनों परिवारों ने शव का दाह संस्कार किया।

जो दाह-संस्कार पहले गलती से हो चुका था। उस शव के फूल-राख इत्यादि जो असली परिजन थे उन्होंने ली और आगे के क्रियाकर्म किए। 

सुनने में आया कि मामला शांत करने के लिए प्रशासन ने दोनों परिवारों को कुछ मुआबजा भी दिया!!

प्रश्न यह है कि ये लापरवाही, इतनी बड़ी गलती कैसे हुई?? इसके लिए कौन जिम्मेदार है??
क्या सिर्फ कांस्टेबल और एसआई जिन्हें निलंबित किया गया?? या प्रशासनिक ढांचा??

मेरे नज़रिए से देखा जाए तो यहाँ पर अपने काम के प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण नहीं था!! वर्ना गलती होती ही नहीं!
"काम ही पूजा है" की युक्ति सरकारी तंत्र में निर्रथक हो गई है।
सरकारी नौकरी की चाह तो सब रखते हैं, क्योंकि वहाँ लचर-पचर ढांचा है। जिंदगी आराम से कट जाती है!! लेकिन अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकता कि लचर-पचर नीति हम और आप जैसे लोगों ने ही बनाई है। 

कोई काम करना नहीं चाहता, किसी को करने नहीं दिया जाता!! हम अपनी पीढ़ियों को भी यही सीख दे रहे हैं। उन्हें नाकारा बना रहे हैं। क्या इसके परिणाम भयंकर नहीं होंगे?? प्राइवेट सेक्टर में मालिक सिर पर है या कार्य का टार्गेट है तो हम अपनी वफादारी और समर्पण भी दे रहे हैं। वहीं सरकारी तंत्र एक-दूसरे से बंधा है, मुख्य व्यक्ति बहुत दूर है तो हम कर्तव्य पथ से विमुख हैं।

मेरे विचार पढ़कर बहुत से लोग सोचेंगे कि हम तो ऐसा नहीं करते, किन्तु उन्हें उनका जबाव आत्मिक सुख नहीं दे पाएगा। मुझे पता है सब लापरवाह नहीं है कुछ तो ऐसे हैं जो ऑफिस समय के बाद घर लाकर भी काम करते हैं क्योंकि उनके लिए "काम ही पूजा है" और समय पर कार्य करके देना जीवन लक्ष्य!!! किन्तु नाकारा लोगों की संख्या सरकारी तंत्र में ज्यादा है जो निलंबित होने के बाद भी नहीं सुधरते!!

कृपया पाठक अपने विचार रखने का कष्ट करें!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 


कामकाजी

आज ऐसा दौर है जिसमें महिलाओ ने अपनी कामयाबी का परचम हर क्षेत्र में लहराया है। 
प्राइवेट सेक्टर, सरकारी क्षेत्र या राजनीति! चपरासी से लेकर ऑफीसर तक! वार्ड पंच से लेकर राष्ट्रपति पद तक! साइकिल चलाने से लेकर जेट उड़ाने तक! 

किन्तु पुरुष उसकी अहमियत समझने के लिए आज भी तैयार नहीं है। 

दफ्तर: प्राइवेट सेक्टर हो या सरकारी, नेताओं का अड्डा हो या फौजियों का रेला, यौन शोषण, गिद्ध दृष्टि आम बात है। दफ्तरों में संस्कारी रिश्ते नहीं, सिर्फ महिला-पुरुष कार्य करते हैं। जो अपने परिवार और रिश्तों के लिए वफादार और समर्पित
है वह दामन पर दाग नहीं लगने देते, चाहे जैसे भी हालातों से गुजरना पड़े। इसमें अधिकतर महिलाएं पास हो जाती हैं। कुछ महिलाएं हालातों से घबरा कर मैदान छोड़ देती हैं और कुछ समझौता करके गर्त में गिर जाती हैं। पुरुष इस मामले में अक्सर फेल होते हैं। वह अपने परिवार से बेवफाई और अन्य महिलाओं पर आधिपत्य स्वयं का जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। समझें भी क्यों न, पुरुषों की दुनिया रोकने वाला कौन??

नज़रों की लेजर से कपड़ो के अंदर तक स्त्रियों के शरीर का एक्सरा करने का हुनर कोई उनसे सीखे।

इसके लिए काफी हद तक महिलाएं ही जिम्मेदार हैं। एक माँ ही सिखा सकती है ब्रह्मचर्य का महत्व, पत्नी और परिवार की अहमियत, रिश्तों का फर्ज, बुजुर्गों का सम्मान, नारी जाति की इज्जत और सबसे अहम औलाद का चरित्र निर्माण एवं उसका स्वाभिमान!!

लगता है जैसे ये सब गायब ही हो गया है। स्त्रियों के कार्य क्षेत्र विस्तार के साथ-साथ अश्लीलता का विस्तार भी तेजी से हुआ है। हनुमानजी के भक्त तो असंख्य हैं किन्तु 'लंगोट के सच्चे' भक्तों की संख्या कम है। सत्य यह भी है कि सीता माता जैसी सीख देने वाली माताएं भी लुप्त हो रही हैं!!

आज की माँ जिस तरह पूर्ण समर्पित होकर, एकाग्रता से कामयाबी पाने में जुट जाती है उसी प्रकार वह अपने बच्चों पर प्यार लुटाने में कंजूसी नहीं करती। स्वयं को भूलकर, अपनी जरूरतें रोक कर औलाद को आगे करती है। बिना संघर्ष किए, बिना कहे जरूरतें पूरी हों, कभी-कभी तो बिना जरूरत के ही चीजें उपलब्ध कराना जो उपेक्षित होकर इधर-उधर पड़ी ठिपराती रहें, औलाद के मन में स्वयं के लिए विशेष महत्व की भावना पैदा करती हैं। 

इन भावनाओं में उपेक्षित ठिपराती वस्तु के जैसी माता-पिता की अहमियत, बड़ों का सम्मान, बहन का आदर, समाज के प्रति नज़रिया, बेटियों एवं अन्य स्त्रियों की इज्जत भी ठिपराने जैसी हो जाती है। संस्कारों पर गाज गिरती है। ऐसी परवरिश वाले बच्चों का समाज एवं लोगों के प्रति नज़रिया बदल जाता है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, ज्ञान का समंदर और अन्य लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं। उन्हें अज्ञानी समझते हैं। विशेषकर महिलाओं को!!
उनके रुआब का शिकार तो सीधा, सच्चा, कमजोर पुरुष होता है। स्वंय से ताकतवर के सामने तो ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं। इनकी बेइज्जती का शिकार अक्सर महिलाएं बनती हैं, क्योंकि ये अपने घर से ही ये लहजा सीख कर निकलते हैं।

माँ-बहनों का अनादर, बात-बात पर ताने इनके लिए आम बात है। घर से निकलते वक्त मां पूछ ले "कहाँ जा रहा है??" प्रश्न का उत्तर देने की बजाय "अरे माँ जाते वक्त पीछे से मत टोका करो, दिन खराब हो जाता है!!" जैसे माँ के टोकने से कलेक्टर के इंटरव्यू में फेल हो जाएंगे। जा रहे हैं आवारागर्दी करने! स्कूल, काॅलेज जाती लड़कियों पर फब्तियाँ कसने!! 

यहाँ मां की गलती है। सही समय पर, उल्टा जबाव सुनकर भी लट्ठ नहीं उठाया, बल्कि बेइज्जती का घूंट चुपचाप पी लिया। अपने स्वाभिमान को ताक पर रखते हुए बेइज्जती सहने का एक अवगुण अपने वजूद में शामिल कर लिया। 

ऐसा ही बहन के साथ होता है। अपनी बहन पर घर से बाहर निकलने पर रोक, टोका-टाकी, कोई छेड़ न दे, और स्वयं दूसरों की बहनों पर अश्लील टिप्पणियाँ करके घर में घुसा है। 

अपनी माँ बहनों का निरादर कर-करके इस कदर तोड़ देते हैं कि बाहर ज्यादती होने पर संघर्ष और जबाव देने की शक्ति ही खत्म हो जाती है, क्योंकि हताश तो घर से ही हैं, लेकिन जिम्मेदार भी खुद ही हैं।

उदाहरणत: किसी दफ्तर में किसी काम से जाओ वहाँ अनियमितताओं का भण्डार मिलेगा। जिससे मिलने गए हो, दो-चार दिन तो वह सीट पर ही नहीं मिलेगा। अगर मिल गया तो महिलाओं के साथ विशेष नजरिया होगा। (चाहे कामकाजी हो या घरेलू) ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को ही अपने ऑफिस के काम से दूसरे ऑफिस में जाना-आना पड़ता है। किसी भी ऑफिस में जाए। (बैंक को छोड़कर) चाहे वह अपने क्षेत्र की तीसमार-खाँ क्यों न हो। ऑफीसर, बाबू या संविदाकर्मी के समक्ष वह बिल्कुल अज्ञानी और गंवार है। उसे न तो बैठने को कहा जाएगा, न ही जल्दी उसका काम ही किया जाएगा। उससे दफ्तर में बार-बार चक्कर लगवाए जाएंगे। एक बार में पूरे कागज उसे बताए ही नहीं जाएंगे। एक पूरा करके लाएगी तब दूसरी कमी बताई जाएगी, 'अज्ञानी होने का अहसास' अरे ये भी नहीं पता?? ये कौन कहे कि रोज-रोज चक्कर लगेगें तो आँखें सेंकने को मिल जाएंगी। ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि उनके घर में भी कामकाजी स्त्रियाँ हैं उनके साथ भी यही हो रहा है! उनके चक्करों का मजा अन्य दागदार चेहरे लेते है। महिलाओं को घूर कर वहशी आँखों को सुकून देते हैं। बस किरदार बदल जाता है। स्त्रियों को सहन करने की सीख देनी तो माँ के पेट से बाहर निकलते ही शुरू हो जाती है।

थोड़ा-बहुत हौसला जुटाने का प्रयास भी करें तो घर के ही दुश्मन बन जाते हैं।

किसी-किसी ऑफिस में तो बैठने के लिए कुर्सियाँ ही न मिलेगी। चाहे जितनी भी देर हो जाए महिला खड़े-खड़े अपना कार्य पूर्ण करेगी। अगर कागजों में छोटी मोटी कमी हो तो लिपिक अपनी होशियारी और ज्ञान का समंदर चीख-चीख कर उढ़ेलेगा ताकि आस-पास के लोगों को लगे कि महिला अज्ञानी है वह अपने क्षेत्र में सिर्फ मक्खियाँ मारती है और लिपिक ज्ञानसागर है! वह ये भूल जाता है कि ज्ञान का समंदर तो छोड़, तेरे ज्ञान का एक लोटा भी उसके किसी काम का नहीं!! अपने क्षेत्र की वह महारथी है। उसके काम का तो सिर्फ तेरा सौम्य व्यवहार, इज्जत से बैठाना, विनीत आवाज में उसकी समस्या सुनना एवं शीघ्र हल करना ताकि तेरे मधुर व्यवहार की छवि अपने दिमाग में लेकर खुश होती हुई जाए और चार लोगों से तेरी प्रसंशा करे। जो तुझे देना चाहिए वो तेरे मां-बाप ने झोली में डाला ही नहीं, जो डाला है वही तो उसे दे रहा है!!

ऐसे सिरफिरे लोग अपने अहम् के चलते दूसरे की मां-बहनों में अपनी माँ-बहन की छवि नहीं देख पाते अगर देखते भी हैं तो इज्जत तो तब ही देगें जब अपनी माँ-बहन और नारी जाति की इज्जत करने के संस्कार घुट्टी में पिलाए गए हों। 

बच्चों को घुट्टी पिलाना और गलती पर ठोकने का चलन खत्म हो गया है। माता-पिता औलाद के सामने अपने बुजुर्ग माता-पिता की अवहेलना करते हैं, जुबान-दराजी करते हैं और बच्चों से आप-आप करके बात करते हुए उन्हें बुजुर्ग की श्रेणी में रख कर स्वयं बच्चे बन जाते हैं। 

परिणामत: बच्चों की तरह व्यवहार और उपेक्षा!! वृद्धाश्रम जाते वक्त शिकायत किससे करोगे?? बीज तो स्वयं बोया है!! 

लेकिन हाँ!! महिला के स्थान पर सामने कोई पुरुष हो तो उसके व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर होगा। अंतर की वजह पुरुष की इज्जत करना नहीं है बल्कि डर है कि वह ऊँची आवाज नहीं सुनेगा औकात और छठी का दूध एक साथ याद दिला देगा। इसलिए उससे तो आगे से ही कहेगा कि भाईसाहब बैठिए दो मिनट मैं अभी आपका काम करता हूँ।

महिलाएँ भी अहम के मामले में पीछे नहीं हैं। ऑफिसर महिलाएं भी महिलाओं के साथ औहदे का अहसास कराते हुए दर्प भरा व्यवहार करती हैं।
उन्हें कमजोरी का अहसास दिलाने में उन्हें भी मजा आता है। वे यह भूल जाती है कि स्वयं भी एक महिला हैं और ये दुनिया पुरुषों की है। महिला के द्वारा महिला को बेचारगी का अहसास कराने का मतलब स्वयं को बेचारा बनाना।

कोई महिला अधिकारी किसी दफ्तर या विद्यालय का निरीक्षण करने जाए तो उसका दोहरा नज़रिया देखते ही बनता है। जगजाहिर है कि हर जगह, हर क्षेत्र में खामियाँ और अच्छाई दोनों मिलती हैं फिर भी निरीक्षण स्थान पर सिर्फ महिलाएं हों तो महिला अधिकारी गिन-गिन कर कमियां निकालेगी। कोई महिलाकर्मी सफाई देना चाहे तो बिल्कुल न सुनेगी, अच्छाई तो उसे एक भी नज़र ही नहीं आएगी। उसके मुंह से ये तो निकलेगा ही नहीं कि इस काम को ऐसे नहीं ऐसे कर लेना। ये ठीक नहीं है। ये नहीं किया, वो नहीं किया। कोई ये बताना चाहे कि क्यों नहीं किया या बता दो कैसे करना है?? बताने के नाम पर जीरो!! 

वही महिला अधिकारी महिला-पुरुष दोनों के बीच निरीक्षण करे तो महिलाओं से तो बात ही नहीं करेगी सिर्फ पुरुष कर्मियों से बात करके खानापूर्ति करेगी, अगर कोई महिला कुछ बोलना चाहे तो नजरंदाज कर देगी।

वही महिला अधिकारी सिर्फ पुरुषों के बीच में निरीक्षण करे तो उसकी टोन ही बदल जाएगी।
वहाँ वह कमियाँ नहीं निकालेगी, सिर्फ ठीक है! ठीक है! कहेगी।

वह कहानी तो सुनी होगी:- एक प्रसिद्ध चित्रकार ने अपने चित्र में खामियाँ जानने के लिए चौराहे पर रख दिया। एक तख्ती लटका दी, "चित्र में जो भी कमी नज़र आए, कृपया उस पर निशान लगा दें!"

चित्र देखा तो उस पर कमियों के इतने निशान थे कि चित्र का वजूद ही छिप गया!!

चित्रकार बहुत निराश हुआ, चित्रकारी से मनोबल टूटने लगा। दुखी होकर वह अपने गुरु के पास गया। अपनी कमियाँ बताई और कहा,"मैं चित्रकारी के लायक नहीं हूँ।"

उसका हतोत्साह देखकर गुरु ने वही चित्र फिर से
उसी चौराहे पर रखवाया। सिर्फ तख्ती की भाषा बदल दी, "चित्र में जो भी कमी नज़र आए, कृपया उस पर निशान लगा कर सुधार कर दें!"

चित्र देखा गया उस पर कमी का एक भी निशान नहीं था!!

यही दुनिया की फितरत है! कमियां निकालने का आसान रास्ता चुनने के लिए सब तत्पर हैं, सुधार का रास्ता कोई नहीं अपनाता!!

ये नज़ररिया 100% लोगों के लिए नहीं है। सब हैवान नहीं होते। एक बलात्कारी है, तो कई रक्षक भी है। कोई पत्नी और परिवार से छिपकर रखैल रख रहा है, तो कोई पत्नी और परिवार के लिए जान जोखिम भी उठा रहा है। लंगोट के कच्चे कम हैं, किन्तु लंगोट के सच्चे ज्यादा है। पत्नी को पीटने वाले कम हैं, मरहम लगाने वाले ज्यादा है।

करवाचौथ पर शराब पीकर घर लौटने वाले कम, पत्नी का आज व्रत है जल्दी घर लौट कर मदद करने वाले ज्यादा हैं। ये दुनिया अच्छे लोगों पर ही टिकी है!

कहते हैं कि 'एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। 'तो ये गंदगी दिन दूनी रात चौगुनी' बढ़ रही है। इस पर पाबंदी माँ की सीख, संस्कार, औलाद के लिए वक्त पर लिया गया सही निर्णय ही लगा सकता है। 

पहल करनी होगी हम और आपको अपने-अपने घरों से। वक्त रहते संभल जाएं तो अच्छा, वर्ना दुनिया नर्क बन जाएगी। जिसमें खूंखार जानवर और बलात्कारी बहुतेरे हो जाएंगे। पता ही न चलेगा किस घर से आया, किस घर में घुस गया!!

इंसान तो स्वार्थ का पुतला है संस्कार ही हैं जो स्वार्थ पर अंकुश लगा कर सीमा में बाँधते हैं।

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)