कुछ दिन बाद अचानक हृदय गति रुकने से ताऊजी का देहांत हो गया। ताई जी के लिए समस्या और बढ़ गई। पति के जाने के बाद बहू का व्यवहार अधिक कटु हो गया, वह बात-बात पर जहर उगलने लगी। सास-बहू का झगड़ा छोटी-मोटी बात पर होता ही रहता।
ताई जी इस कलह से तंग आकर अपने देवर के बेटे के यहाँ चली गईं, फिर वह मरते दम तक न लौटी।
देवर के बेटे के यहाँ उन्हें मान-सम्मान मिला। बुढ़ापा अच्छे से कट गया।
उनकी एक आदत थी कि वह खाने-पीने की चीजें तीन-चार दिन तक रखती, उन्हें कूट-पीस कर खाती रहती। देवर का बेटा और बहू उन्हें बहुत समझाते कि तुम्हें जब भी खाना हो कहो हम तुम्हें ताजा खिलाएंगे।
वह आदत से मजबूर मानती ही नहीं थी।
मकर संक्राति पर देवर के बेटे की बहू ने उन्हें संकल्प करके टिकिया, मंगोड़ी, तिल लड्डू इत्यादि खाने की चीजें दीं।
उन्होंने पेट भर खाया और बची हुई सामग्री बाद में खाने के लिए एक कपड़े में बाँध कर चक्की के ऊपर रख दी।
खा-पीकर खाट पर लेट आराम करने लगी। एक कुत्ता निगाह बचाकर कब अंदर घुस गया पता ही न चला, जब वह खाद्य सामग्री की पोटली लेकर बाहर निकला तब ताई जी की नज़र पड़ी कि कुत्ता उनका नाश्ता ले जा रहा है।
वे कुत्ते के पीछे डण्डा लेकर चिल्लाते हुए भागी।
हाय! कुत्ता मेरा नाश्ता ले जा रहा है....
हाय! कुत्ता मेरा नाश्ता ले जा रहा है....
आगे-आगे कुत्ता पीछे-पीछे ताईजी!
जब कुत्ता आँखों से ओझल हो गया तब वापस लौटी।
बहू ने समझाया क्या जरूरत थी कुत्ते के पीछे भागने की। ले गया तो ले जाने देती और बन जाएगा!!
लेकिन वे कहाँ समझने वाली थी बच्चों की तरह हरकतें करती ही रहती!!
बीमार पड़ी तो फिर उठ न सकीं। इलाज भी कराया किन्तु बुढ़ापे का कोई इलाज नहीं होता। एक महीने खटिया पर पड़े रहने के बाद वे भगवान के घर चली
गई।
उनकी मौत की खबर सुनकर भी उनकी बहू नहीं सिर्फ बेटा आया। बेटे से दाह-संस्कार करने के लिए कहा तो उसने कहा कि वह 13 दिन नहीं रुक पाएगा इसलिए दाग नहीं दे सकता। देवर के बेटे ने ही दाह-संस्कार का फ़र्ज निभाया!!
जैसी जिसकी नियति!!
वैसे भी मरने के बाद कौन देखता है कि चिता को आग खुद का बेटा लगा रहा है या देवर का बेटा!!
So Sad 😞😔
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)
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