Wednesday, 22 February 2023

साइकिल

80 के दशक की बात है, कविता 12वीं कक्षा की छात्रा थी। साइकिल से स्कूल जाती। स्कूल करीबन 3 किलोमीटर दूर था। वह वालीबॉल प्लेयर थी, इसलिए स्कूल में वालीबॉल का अभ्यास करके ही शाम को घर जाती। सर्दियों के दिन थे। पाँच बजे ही अंधेरा घिरने लगा। निश्चिंत थी कि घर पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा किन्तु थोड़ा सा चलते ही साइकिल की चैन टूट गई। वह बहुत डर गई। आसपास सुनसान। लम्बा रास्ता साईकिल को घसीटते हुए कैसे तय करे?? अंधेरा बढ़ने के साथ-साथ घबराहट भी बढ़ रही थी! इक्का-दुक्का लोग निकल रहे थे किससे मदद मांगे?? 

दो लड़के साइकिल पर आते दिखे उसने अपनी रफ्तार तेज करदी, लेकिन वे साइकिल पर और वह पैदल, शीघ्र ही वे नजदीक आ गए, साइकिल की रफ्तार भी कम कर ली, डर के मारे उसके हाथ-पांव फूलने लगे!!

एक लड़का बोला, "क्या हुआ??"
दूसरा, "पैदल क्यों जा रही हो??"
:हम कुछ मदद करें क्या??"
कविता के मुँह से कोई आवाज नहीं निकली!

तभी उसकी नज़र पुलिस लाइन पर पड़ी। घबराहट के मारे उसने अपने कदम पुलिस लाइन की ओर मोड़ लिए। साइकिल घसीटते हुए पुलिस लाइन में प्रवेश कर गई। पहला घर दिखा उसी का दरवाजा खटखटा दिया! 

लेकिन ये क्या!! दोनों लड़के भी पुलिस लाइन की ओर ही आ गए। बिना कुछ बोले उसके पास आके खड़े हो गए। उन्हें अपने नजदीक देख कर घबराहट और बढ़ गई। 

कविता: (डरते हुए) "तुम मेरा पीछा कर रहे हो??"
लड़के: नहीं! नहीं!

तभी दरवाजा खुला।

लगभग 18-20 साल के लड़के ने दरवाजा खोला, कविता की ओर देख कर बोला, "कहिए किससे मिलना है??"

कविता: (भरी सर्दी में पसीने से तर-बतर घबराते हुए) "मेरी साइकिल की चैन टूट गई है, ये लड़के मेरा पीछा करते हुए यहाँ तक आ गए हैं।"

लड़का उनको देख कर हँसा! 

उसने अपनी माँ को आवाज दी। उसकी माँ और बहन दोनों बाहर आईं, कविता को अंदर ले जाकर बिठाया और पानी पिलाया।

लड़के की माँ ने बताया, "ये मेरा छोटा बेटा है, तुम्हारा पीछा करते हुए नहीं आया ये उसका घर है।
थोड़ा आगे जाकर दूसरा लड़का, जो इसका दोस्त है, उसका घर है। अपने बेटे की तरफ देखकर व्यंग्य से हंसते हुए, मेरा बेटा लोफर तो नहीं लगता पता नहीं तुमने कैसे इसे लोफर समझ लिया??

माँ की बात सुनकर उसकी बहन भी हंसने लगी।

मेरी तरफ मुखातिब होकर, "तुम अपनी साइकिल यहीं छोड़ दो मेरा छोटा बेटा कल ठीक करा देगा। तुम्हारे माता-पिता परेशान हो रहे होंगे, मेरा बेटा और बेटी तुम्हें घर छोड़ देंगे।"

कविता बाइक पर बैठकर उनके बेटा और बेटी के साथ अपने घर पहुंची। उसके घरवाले उसके लिए बहुत चिंतित थे। उसके पिता और भाई उसे ढूँढ़ने के लिए घर से बाहर आ गए थे, बाइक की आवाज सुन कर रुके। कविता को देखा तो उनकी जान में जान आई।

कविता की आपबीती सुनकर परिवार वाले उनका धन्यवाद देते नहीं थक रह थे। बार-बार मनुहार करके उन्हें चाय नाश्ता कराया। आगे भी आते रहने का आग्रह किया।

दूसरे दिन कविता ने अपनी साइकिल उनके यहाँ से उठाई, जो कि ठीक करा कर रखी गई थी। उसे जबरदस्ती खाना भी खिला दिया, कहा, "कल तो तुम जल्दी में थी इसलिए हमने तुम्हें नहीं रोका।"

उनकी बेटी उसकी अच्छी दोस्त बन गई। दोनों घरों में आना-जाना होने लगा। वे अक्सर बाहर घूमने साथ जाते। ये आना-जाना इतना बढ़ गया कि आज वह घर कविता का ससुराल है। पहली बार कविता जिसकी बाइक पर बैठी, वही उसका पति है। वे दोनों कब इतने करीब आ गए पता ही न चला। दोनों परिवारों को कोई आपत्ति नहीं थी, उनकी शादी हो गई। आज कविता दो बेटों की माँ है। सास-ससुर की लाड़ली बहु है। वह अपने परिवार में बहुत खुश हूँ। ईश्वर की बड़ी कृपा है।
धन्यवाद 🙏🙏

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)

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