Wednesday, 22 February 2023

कामकाजी

आज ऐसा दौर है जिसमें महिलाओ ने अपनी कामयाबी का परचम हर क्षेत्र में लहराया है। 
प्राइवेट सेक्टर, सरकारी क्षेत्र या राजनीति! चपरासी से लेकर ऑफीसर तक! वार्ड पंच से लेकर राष्ट्रपति पद तक! साइकिल चलाने से लेकर जेट उड़ाने तक! 

किन्तु पुरुष उसकी अहमियत समझने के लिए आज भी तैयार नहीं है। 

दफ्तर: प्राइवेट सेक्टर हो या सरकारी, नेताओं का अड्डा हो या फौजियों का रेला, यौन शोषण, गिद्ध दृष्टि आम बात है। दफ्तरों में संस्कारी रिश्ते नहीं, सिर्फ महिला-पुरुष कार्य करते हैं। जो अपने परिवार और रिश्तों के लिए वफादार और समर्पित
है वह दामन पर दाग नहीं लगने देते, चाहे जैसे भी हालातों से गुजरना पड़े। इसमें अधिकतर महिलाएं पास हो जाती हैं। कुछ महिलाएं हालातों से घबरा कर मैदान छोड़ देती हैं और कुछ समझौता करके गर्त में गिर जाती हैं। पुरुष इस मामले में अक्सर फेल होते हैं। वह अपने परिवार से बेवफाई और अन्य महिलाओं पर आधिपत्य स्वयं का जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। समझें भी क्यों न, पुरुषों की दुनिया रोकने वाला कौन??

नज़रों की लेजर से कपड़ो के अंदर तक स्त्रियों के शरीर का एक्सरा करने का हुनर कोई उनसे सीखे।

इसके लिए काफी हद तक महिलाएं ही जिम्मेदार हैं। एक माँ ही सिखा सकती है ब्रह्मचर्य का महत्व, पत्नी और परिवार की अहमियत, रिश्तों का फर्ज, बुजुर्गों का सम्मान, नारी जाति की इज्जत और सबसे अहम औलाद का चरित्र निर्माण एवं उसका स्वाभिमान!!

लगता है जैसे ये सब गायब ही हो गया है। स्त्रियों के कार्य क्षेत्र विस्तार के साथ-साथ अश्लीलता का विस्तार भी तेजी से हुआ है। हनुमानजी के भक्त तो असंख्य हैं किन्तु 'लंगोट के सच्चे' भक्तों की संख्या कम है। सत्य यह भी है कि सीता माता जैसी सीख देने वाली माताएं भी लुप्त हो रही हैं!!

आज की माँ जिस तरह पूर्ण समर्पित होकर, एकाग्रता से कामयाबी पाने में जुट जाती है उसी प्रकार वह अपने बच्चों पर प्यार लुटाने में कंजूसी नहीं करती। स्वयं को भूलकर, अपनी जरूरतें रोक कर औलाद को आगे करती है। बिना संघर्ष किए, बिना कहे जरूरतें पूरी हों, कभी-कभी तो बिना जरूरत के ही चीजें उपलब्ध कराना जो उपेक्षित होकर इधर-उधर पड़ी ठिपराती रहें, औलाद के मन में स्वयं के लिए विशेष महत्व की भावना पैदा करती हैं। 

इन भावनाओं में उपेक्षित ठिपराती वस्तु के जैसी माता-पिता की अहमियत, बड़ों का सम्मान, बहन का आदर, समाज के प्रति नज़रिया, बेटियों एवं अन्य स्त्रियों की इज्जत भी ठिपराने जैसी हो जाती है। संस्कारों पर गाज गिरती है। ऐसी परवरिश वाले बच्चों का समाज एवं लोगों के प्रति नज़रिया बदल जाता है। वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, ज्ञान का समंदर और अन्य लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं। उन्हें अज्ञानी समझते हैं। विशेषकर महिलाओं को!!
उनके रुआब का शिकार तो सीधा, सच्चा, कमजोर पुरुष होता है। स्वंय से ताकतवर के सामने तो ये भीगी बिल्ली बन जाते हैं। इनकी बेइज्जती का शिकार अक्सर महिलाएं बनती हैं, क्योंकि ये अपने घर से ही ये लहजा सीख कर निकलते हैं।

माँ-बहनों का अनादर, बात-बात पर ताने इनके लिए आम बात है। घर से निकलते वक्त मां पूछ ले "कहाँ जा रहा है??" प्रश्न का उत्तर देने की बजाय "अरे माँ जाते वक्त पीछे से मत टोका करो, दिन खराब हो जाता है!!" जैसे माँ के टोकने से कलेक्टर के इंटरव्यू में फेल हो जाएंगे। जा रहे हैं आवारागर्दी करने! स्कूल, काॅलेज जाती लड़कियों पर फब्तियाँ कसने!! 

यहाँ मां की गलती है। सही समय पर, उल्टा जबाव सुनकर भी लट्ठ नहीं उठाया, बल्कि बेइज्जती का घूंट चुपचाप पी लिया। अपने स्वाभिमान को ताक पर रखते हुए बेइज्जती सहने का एक अवगुण अपने वजूद में शामिल कर लिया। 

ऐसा ही बहन के साथ होता है। अपनी बहन पर घर से बाहर निकलने पर रोक, टोका-टाकी, कोई छेड़ न दे, और स्वयं दूसरों की बहनों पर अश्लील टिप्पणियाँ करके घर में घुसा है। 

अपनी माँ बहनों का निरादर कर-करके इस कदर तोड़ देते हैं कि बाहर ज्यादती होने पर संघर्ष और जबाव देने की शक्ति ही खत्म हो जाती है, क्योंकि हताश तो घर से ही हैं, लेकिन जिम्मेदार भी खुद ही हैं।

उदाहरणत: किसी दफ्तर में किसी काम से जाओ वहाँ अनियमितताओं का भण्डार मिलेगा। जिससे मिलने गए हो, दो-चार दिन तो वह सीट पर ही नहीं मिलेगा। अगर मिल गया तो महिलाओं के साथ विशेष नजरिया होगा। (चाहे कामकाजी हो या घरेलू) ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को ही अपने ऑफिस के काम से दूसरे ऑफिस में जाना-आना पड़ता है। किसी भी ऑफिस में जाए। (बैंक को छोड़कर) चाहे वह अपने क्षेत्र की तीसमार-खाँ क्यों न हो। ऑफीसर, बाबू या संविदाकर्मी के समक्ष वह बिल्कुल अज्ञानी और गंवार है। उसे न तो बैठने को कहा जाएगा, न ही जल्दी उसका काम ही किया जाएगा। उससे दफ्तर में बार-बार चक्कर लगवाए जाएंगे। एक बार में पूरे कागज उसे बताए ही नहीं जाएंगे। एक पूरा करके लाएगी तब दूसरी कमी बताई जाएगी, 'अज्ञानी होने का अहसास' अरे ये भी नहीं पता?? ये कौन कहे कि रोज-रोज चक्कर लगेगें तो आँखें सेंकने को मिल जाएंगी। ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि उनके घर में भी कामकाजी स्त्रियाँ हैं उनके साथ भी यही हो रहा है! उनके चक्करों का मजा अन्य दागदार चेहरे लेते है। महिलाओं को घूर कर वहशी आँखों को सुकून देते हैं। बस किरदार बदल जाता है। स्त्रियों को सहन करने की सीख देनी तो माँ के पेट से बाहर निकलते ही शुरू हो जाती है।

थोड़ा-बहुत हौसला जुटाने का प्रयास भी करें तो घर के ही दुश्मन बन जाते हैं।

किसी-किसी ऑफिस में तो बैठने के लिए कुर्सियाँ ही न मिलेगी। चाहे जितनी भी देर हो जाए महिला खड़े-खड़े अपना कार्य पूर्ण करेगी। अगर कागजों में छोटी मोटी कमी हो तो लिपिक अपनी होशियारी और ज्ञान का समंदर चीख-चीख कर उढ़ेलेगा ताकि आस-पास के लोगों को लगे कि महिला अज्ञानी है वह अपने क्षेत्र में सिर्फ मक्खियाँ मारती है और लिपिक ज्ञानसागर है! वह ये भूल जाता है कि ज्ञान का समंदर तो छोड़, तेरे ज्ञान का एक लोटा भी उसके किसी काम का नहीं!! अपने क्षेत्र की वह महारथी है। उसके काम का तो सिर्फ तेरा सौम्य व्यवहार, इज्जत से बैठाना, विनीत आवाज में उसकी समस्या सुनना एवं शीघ्र हल करना ताकि तेरे मधुर व्यवहार की छवि अपने दिमाग में लेकर खुश होती हुई जाए और चार लोगों से तेरी प्रसंशा करे। जो तुझे देना चाहिए वो तेरे मां-बाप ने झोली में डाला ही नहीं, जो डाला है वही तो उसे दे रहा है!!

ऐसे सिरफिरे लोग अपने अहम् के चलते दूसरे की मां-बहनों में अपनी माँ-बहन की छवि नहीं देख पाते अगर देखते भी हैं तो इज्जत तो तब ही देगें जब अपनी माँ-बहन और नारी जाति की इज्जत करने के संस्कार घुट्टी में पिलाए गए हों। 

बच्चों को घुट्टी पिलाना और गलती पर ठोकने का चलन खत्म हो गया है। माता-पिता औलाद के सामने अपने बुजुर्ग माता-पिता की अवहेलना करते हैं, जुबान-दराजी करते हैं और बच्चों से आप-आप करके बात करते हुए उन्हें बुजुर्ग की श्रेणी में रख कर स्वयं बच्चे बन जाते हैं। 

परिणामत: बच्चों की तरह व्यवहार और उपेक्षा!! वृद्धाश्रम जाते वक्त शिकायत किससे करोगे?? बीज तो स्वयं बोया है!! 

लेकिन हाँ!! महिला के स्थान पर सामने कोई पुरुष हो तो उसके व्यवहार में जमीन आसमान का अंतर होगा। अंतर की वजह पुरुष की इज्जत करना नहीं है बल्कि डर है कि वह ऊँची आवाज नहीं सुनेगा औकात और छठी का दूध एक साथ याद दिला देगा। इसलिए उससे तो आगे से ही कहेगा कि भाईसाहब बैठिए दो मिनट मैं अभी आपका काम करता हूँ।

महिलाएँ भी अहम के मामले में पीछे नहीं हैं। ऑफिसर महिलाएं भी महिलाओं के साथ औहदे का अहसास कराते हुए दर्प भरा व्यवहार करती हैं।
उन्हें कमजोरी का अहसास दिलाने में उन्हें भी मजा आता है। वे यह भूल जाती है कि स्वयं भी एक महिला हैं और ये दुनिया पुरुषों की है। महिला के द्वारा महिला को बेचारगी का अहसास कराने का मतलब स्वयं को बेचारा बनाना।

कोई महिला अधिकारी किसी दफ्तर या विद्यालय का निरीक्षण करने जाए तो उसका दोहरा नज़रिया देखते ही बनता है। जगजाहिर है कि हर जगह, हर क्षेत्र में खामियाँ और अच्छाई दोनों मिलती हैं फिर भी निरीक्षण स्थान पर सिर्फ महिलाएं हों तो महिला अधिकारी गिन-गिन कर कमियां निकालेगी। कोई महिलाकर्मी सफाई देना चाहे तो बिल्कुल न सुनेगी, अच्छाई तो उसे एक भी नज़र ही नहीं आएगी। उसके मुंह से ये तो निकलेगा ही नहीं कि इस काम को ऐसे नहीं ऐसे कर लेना। ये ठीक नहीं है। ये नहीं किया, वो नहीं किया। कोई ये बताना चाहे कि क्यों नहीं किया या बता दो कैसे करना है?? बताने के नाम पर जीरो!! 

वही महिला अधिकारी महिला-पुरुष दोनों के बीच निरीक्षण करे तो महिलाओं से तो बात ही नहीं करेगी सिर्फ पुरुष कर्मियों से बात करके खानापूर्ति करेगी, अगर कोई महिला कुछ बोलना चाहे तो नजरंदाज कर देगी।

वही महिला अधिकारी सिर्फ पुरुषों के बीच में निरीक्षण करे तो उसकी टोन ही बदल जाएगी।
वहाँ वह कमियाँ नहीं निकालेगी, सिर्फ ठीक है! ठीक है! कहेगी।

वह कहानी तो सुनी होगी:- एक प्रसिद्ध चित्रकार ने अपने चित्र में खामियाँ जानने के लिए चौराहे पर रख दिया। एक तख्ती लटका दी, "चित्र में जो भी कमी नज़र आए, कृपया उस पर निशान लगा दें!"

चित्र देखा तो उस पर कमियों के इतने निशान थे कि चित्र का वजूद ही छिप गया!!

चित्रकार बहुत निराश हुआ, चित्रकारी से मनोबल टूटने लगा। दुखी होकर वह अपने गुरु के पास गया। अपनी कमियाँ बताई और कहा,"मैं चित्रकारी के लायक नहीं हूँ।"

उसका हतोत्साह देखकर गुरु ने वही चित्र फिर से
उसी चौराहे पर रखवाया। सिर्फ तख्ती की भाषा बदल दी, "चित्र में जो भी कमी नज़र आए, कृपया उस पर निशान लगा कर सुधार कर दें!"

चित्र देखा गया उस पर कमी का एक भी निशान नहीं था!!

यही दुनिया की फितरत है! कमियां निकालने का आसान रास्ता चुनने के लिए सब तत्पर हैं, सुधार का रास्ता कोई नहीं अपनाता!!

ये नज़ररिया 100% लोगों के लिए नहीं है। सब हैवान नहीं होते। एक बलात्कारी है, तो कई रक्षक भी है। कोई पत्नी और परिवार से छिपकर रखैल रख रहा है, तो कोई पत्नी और परिवार के लिए जान जोखिम भी उठा रहा है। लंगोट के कच्चे कम हैं, किन्तु लंगोट के सच्चे ज्यादा है। पत्नी को पीटने वाले कम हैं, मरहम लगाने वाले ज्यादा है।

करवाचौथ पर शराब पीकर घर लौटने वाले कम, पत्नी का आज व्रत है जल्दी घर लौट कर मदद करने वाले ज्यादा हैं। ये दुनिया अच्छे लोगों पर ही टिकी है!

कहते हैं कि 'एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। 'तो ये गंदगी दिन दूनी रात चौगुनी' बढ़ रही है। इस पर पाबंदी माँ की सीख, संस्कार, औलाद के लिए वक्त पर लिया गया सही निर्णय ही लगा सकता है। 

पहल करनी होगी हम और आपको अपने-अपने घरों से। वक्त रहते संभल जाएं तो अच्छा, वर्ना दुनिया नर्क बन जाएगी। जिसमें खूंखार जानवर और बलात्कारी बहुतेरे हो जाएंगे। पता ही न चलेगा किस घर से आया, किस घर में घुस गया!!

इंसान तो स्वार्थ का पुतला है संस्कार ही हैं जो स्वार्थ पर अंकुश लगा कर सीमा में बाँधते हैं।

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 

No comments:

Post a Comment