लोगों की बातचीत शुरू हो गई......
एक: अरे! क्या हुआ?? कैसी चीख पुकार है??
दूसरा: बाबू को कुत्ता खा गया!
तीसरा: कैसै??
कोई एक: कानूनगो साहब के चबूतरे पर सो रहा था। मुँह तक चादर ओढ़ रखी थी, कुत्ते ने चादर के ऊपर से ही नाक पर से मांस खींचकर बुरी तरह घायल कर दिया है।
कोई दूसरा: बेचारा! घर में जगह नहीं है दूसरे के दरवाजे पर सोना पड़ता है।
जबसे भाई की शादी हुई है। बेचारे का घर निकाला हो गया।
बाबू के घर वाले आ गए। बाबू की माँ ने कपड़े से खून साफ कर लाल मिर्च पाउडर भर दिया।
बाबू बुरी तरह तड़पने लगा, डकराने लगा।
किसी ने कहा: अस्पताल ले जाओ!
पिता ने कहा, "सुबह ले जाएंगे!!"
भीड़ छंट गई, सब अपने-अपने घरों में घुस गए।
माता-पिता भी चले गए।
बाबू सिसकता रहा। पास ही उसका एक साथी बैठा रहा। उसे सांत्वना देता रहा। सुबह अस्पताल चलेंगे, तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा।
उसका साथी बातों से बाबू का ध्यान बंटाकर दर्द कम करने का प्रयास कर रहा था।
साथी: "बाबू एक बात बता, क्या तुझे पता नहीं चला, कि कुत्ता है! कोई आहट नहीं हुई??"
बाबू: "आहट तो हुई थी, लेकिन मैंने समझा कि ठकुराइन वापस जा रही है। इसलिए मैंने चादर नहीं हटाई। मैं तो जाग रहा था। उसके भ्रम में कुत्ते का शिकार हो गया।"
सन् 80 के दशक का वाकया है।
ठकुराइन सामने के घर की औरत थी, उसके तीन बेटे थे। बड़ा बेटा लगभग 16-17 साल का, दो उससे एक एक साल छोटे। ठकुराइन का पति ट्रक ड्राइवर जो अक्सर घर से बाहर रहता।
कानूनगो लगभग 50-55 वर्षीय रिटायर्मेंट के नज़दीक गोरखपुर के रहने वाले थे। इकलौता बेटा और पत्नी गोरखपुर में रहते थे। वे कभी-कभार कानूनगो से मिलने आते। कानूनगो का गोरखपुर जाना कम ही हो पाता। एक-दो दिन की छुट्टी में घर जाते नहीं थे, लम्बी छुट्टी लेने का प्रयास नहीं किया। एक गाय पाल रखी थी, बाहर जाते तो उसकी देखभाल के लिए किसी व्यक्ति को रख कर जाते और दो एक दिन में वापस आ जाते। पति-पत्नी से दूर रहने वाले ठकुराइन और कानूनगो एक-दूसरे के करीब आ गए। ठकुराइन को पैसे की दरकार और कानूनगो पर पैसे की कमी नहीं।
ठकुराइन रात को अपने घर का दरवाजा खोलती और चुपके से कानूनगो के घर में घुस जाती।
उन दोनों के सम्बन्ध को लेकर मौहल्ले में कानाफूसी जोरों पर थी, शायद ही कोई हो जिन्हें उन दोनों के बारे में पता नहीं हो। कानूनगो मुहल्ले में सबके साथ अच्छा व्यवहार रखते और जरूरत मंद को कर्जा भी देते रहते। इसलिए मौहल्ले के लोग उनकी करतूत को नजरंदाज करते। यही वजह थी कि बाबू उनके घर के आगे चबूतरे पर सो जाता, लेकिन वह उनकी ही करतूत की वजह से कुत्ते का शिकार हो गया।
दूसरे दिन बाबू अपने दोस्त के साथ अस्पताल गया। वहाँ कुत्ते के काटने पर लगने वाला इंजेक्शन एंटी रैबीज उपलब्ध नहीं हो पाया। स्वयं के पैसे से इंजेक्शन खरीद कर लगवाने की बाबू की हैसियत नहीं थी।
दिन पर दिन बाबू की तबियत खराब होने लगी लेकिन इंजेक्शन की व्यवस्था नहीं हो पाई।
देशी इलाज, झाड़-फूंक, कुंड पर ले जाकर नहलाया भी गया, लेकिन सब बेकार!!
कुछ दिनों की असीम पीड़ा झेलकर बाबू ने कुत्ते की तरह भोंक-भोंक कर तड़पते हुए दम तोड़ दिया।
इस दुनिया में इंसान की जिंदगी बहुत सस्ती है!!
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)
No comments:
Post a Comment