Wednesday, 22 February 2023

शव बदल गया

कुछ समय पूर्व की ही बात है एक बड़े हादसे में कई लोग घायल हुए और दो लोगों की मौत भी हुई। दोनों शवों को पोस्टमार्टम के पश्चात मोर्चरी में रखवा दिया गया। 

एक शव का चेहरा कुचलने के कारण पहचान में नहीं आ रहा था। जब उसके परिजन बाॅडी लेने आए तो गलती से दूसरा शव (जो उनका परिजन नहीं था और चेहरा भी सही सलामत था) उनके हवाले कर दिया। परिजनों ने चेहरा देखने की जहमत नहीं उठाई क्योंकि उनके मुताबिक कुचलने की वजह से चेहरे की पहचान नहीं हो पाएगी।
पोस्टमार्टम के पश्चात जैसी बॉडी उन्हें प्राप्त हुई, उन्होंने उसका दाह संस्कार कर दिया।

दूसरे शव के परिजन डैडबॉडी लेने आए तो स्वाभाविक था कि उसकी पहचान करेंगे, क्योंकि वह अपने परिजन के शव को पहचानते थे। पोस्टमार्टम से पहले उसकी शिनाख्त कर चुके थे।
उन्होंने जैसे ही शव का कुचला चेहरा देखा तो सन्न
रह गए, ये उनके परिजन का शव नहीं था। 
'ये हमारा व्यक्ति नहीं है' चीख चिल्लाहट शुरू हो गई। 
तैनात पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। उनको समझ में आ गया कि बहुत बड़ी गलती हो गई है।
परिजनों को शान्त करने का प्रयास किया गया किन्तु वे तो आपे से बाहर थे क्योंकि उनके परिजन के शव का दाह-संस्कार तो कोई अन्य परिवार कर चुका था। सामने पड़ी हुई डैडबॉडी उनके परिजन की नहीं थी, दाह-संस्कार का तो सवाल ही नहीं था। 

हड़कंप मच गया। पूरा प्रशासन इकट्ठा हो गया।
एक एसआई दो कांस्टेबल तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिए गए, क्योंकि डैडबॉडी उन्हीं के प्रभुत्व में थी और उन्हीं के द्वारा परिजनों के सुपुर्द की गई थी।

डैडबाॅडी के असली परिजनों को बुलाया गया। उन्हें यथास्थिति से अवगत कराया गया। उन्हें भी बड़ा ताज्जुब हुआ कि वे किसी अन्य शव का दाह-संस्कार कर चुके हैं। और उनके परिजन का शव अभी तक मोर्चरी में ही पड़ा है।

तीन दिन तक मामला बहुत गर्माता रहा। क्या होगा?? हर किसी को यही जिज्ञासा थी!!

प्रशासन के दखल एवं गाँव की समझाइश से तीन दिन बाद मामला शांत हुआ कि जो हो चुका है वह तो वापस नहीं आ सकता!! दोनों परिवार आपसी समझौते से काम लें और मिलकर दाह-संस्कार कर दें। प्रशासन की उपस्थिति में दोनों परिवारों ने शव का दाह संस्कार किया।

जो दाह-संस्कार पहले गलती से हो चुका था। उस शव के फूल-राख इत्यादि जो असली परिजन थे उन्होंने ली और आगे के क्रियाकर्म किए। 

सुनने में आया कि मामला शांत करने के लिए प्रशासन ने दोनों परिवारों को कुछ मुआबजा भी दिया!!

प्रश्न यह है कि ये लापरवाही, इतनी बड़ी गलती कैसे हुई?? इसके लिए कौन जिम्मेदार है??
क्या सिर्फ कांस्टेबल और एसआई जिन्हें निलंबित किया गया?? या प्रशासनिक ढांचा??

मेरे नज़रिए से देखा जाए तो यहाँ पर अपने काम के प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण नहीं था!! वर्ना गलती होती ही नहीं!
"काम ही पूजा है" की युक्ति सरकारी तंत्र में निर्रथक हो गई है।
सरकारी नौकरी की चाह तो सब रखते हैं, क्योंकि वहाँ लचर-पचर ढांचा है। जिंदगी आराम से कट जाती है!! लेकिन अपने गिरेबान में कोई नहीं झांकता कि लचर-पचर नीति हम और आप जैसे लोगों ने ही बनाई है। 

कोई काम करना नहीं चाहता, किसी को करने नहीं दिया जाता!! हम अपनी पीढ़ियों को भी यही सीख दे रहे हैं। उन्हें नाकारा बना रहे हैं। क्या इसके परिणाम भयंकर नहीं होंगे?? प्राइवेट सेक्टर में मालिक सिर पर है या कार्य का टार्गेट है तो हम अपनी वफादारी और समर्पण भी दे रहे हैं। वहीं सरकारी तंत्र एक-दूसरे से बंधा है, मुख्य व्यक्ति बहुत दूर है तो हम कर्तव्य पथ से विमुख हैं।

मेरे विचार पढ़कर बहुत से लोग सोचेंगे कि हम तो ऐसा नहीं करते, किन्तु उन्हें उनका जबाव आत्मिक सुख नहीं दे पाएगा। मुझे पता है सब लापरवाह नहीं है कुछ तो ऐसे हैं जो ऑफिस समय के बाद घर लाकर भी काम करते हैं क्योंकि उनके लिए "काम ही पूजा है" और समय पर कार्य करके देना जीवन लक्ष्य!!! किन्तु नाकारा लोगों की संख्या सरकारी तंत्र में ज्यादा है जो निलंबित होने के बाद भी नहीं सुधरते!!

कृपया पाठक अपने विचार रखने का कष्ट करें!!

स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान) 


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