करीब नब्बे के दशक की बात है छठी कक्षा में पढ़ने वाली कविता सात बजे स्कूल जा रही थी कि उसने देखा सड़क से कुछ दूर बहुत भीड़ है वहाँ पुलिस वाले भी खड़े हैं!!
स्कूल को भूलकर कविता भीड़ की ओर मुड़ गई।
वहाँ जाकर देखा कि एक बहुत बड़ा गड्डा जिसमें पानी भरा रहता था, गर्मी का मौसम है पानी सूख गया है, अब दलदल है एक आदमी का कंकाल उसमें धंसा दिखाई दे रहा है। पुलिस की संख्या बढ़
गई। धीरे-धीरे कंकाल बाहर निकाला गया,और जाँच के लिए भेज दिया गया। पुलिस के मुताबिक
कंकाल छः से आठ माह पुराना हो सकता है। क्योंकि बारिश के दौरान इकट्ठा हुआ पानी गर्मी के दिनों में सूखने लगता है! इसलिए कंकाल नज़र आने लगा।
पुलिस की छानबीन शुरु हुई, गुमशुदा व्यक्तियों की
सूचना पर नजर डाली तो इस दौरान आसपास के इलाके से करीबन 3 व्यक्ति गुमशुदा थे, एक 15-16 साल की लड़की, 20-22 साल का लड़का जो थोड़ा विक्षिप्त था और एक 55 साल का अधेड़। तीनों की छानबीन जारी थी।
जांच में पता चला कि 6 माह पूर्व गायब हुए दिनेश रस्तोगी की लाश है। पारिवारिक सदस्य के डीएनए जाँच से मिलान हो जाने के साथ ही स्पष्ट हो गया।
पुलिस ने कंकाल परिवार को सौंप दिया और जाँच में जुट गई। परिवार से भी पूछताछ की कि अंतिम बार वह कहाँ और किसके साथ गए। परिवार ने बताया कि अपने दोस्त रमेश चंद्र के साथ ज्यादातर समय बिताते थे। दोनों की दुकानें पास-पास थीं इसलिए आना-जाना भी साथ-साथ करते थे।
गायब होने से पहले भी दोनों एक साथ थे।
रमेश चंद्र के मुताबिक मैं अपने घर चला गया और दिनेश अपने घर। किन्तु वे घर नहीं पहुँचे। घर वालों ने दो दिन तक इंतजार किया, जगह-जगह तलाश की, खोज खबर न मिलने पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी लेकिन कोई खोज-खबर न लगी, मामला भी थोड़ा ढीला पड़ गया।
कंकाल मिलने पर पुलिस ने तफ्तीश फिरसे शुरू करदी। पुलिस की तफ्तीश बार-बार रमेश चंद्र के घर आकर रुक जाती। रमेश एक जबाव देते कि दिनेश अपने घर की राह मुड़ गए थे। एक बार को तो पुलिस भी यही सोचने लगी कि दिनेश नशे में था हो सकता गड्डे के पास से गुजरते हुए उसका पैर फिसल गया हो और वह दलदल से न निकल पाया हो। जाँच में सिर की हड्डी टूटी बताई गई है उसकी वजह गड्डे में किसी पत्थर से टकराना भी हो सकता है।
किसी ने मर्डर किया हो ऐसी भी कोई वजह नजर नहीं आ रही!!
तभी एक खबरी के द्वारा सुराग दिया गया कि दोनों थोड़ी दूर पर रहने वाली एक विधवा शारदा जिसकी उम्र 40-45 के आसपास रही होगी अक्सर उससे मिलने जाया करते थे और अच्छा-खासा वक्त उसके साथ बिताते थे। रमेश बाद में भी शारदा से मिलता रहा लेकिन कुछ दिन पहले उसने उससे मिलना-जुलना छोड़ दिया है।
बस क्या था पुलिस पहुंच गई शारदा के घर पूछताछ में शारदा ने इतना ही बताया कि दिनेश कभी कभी आता था और जिस दिन गायब हुआ था उस दिन भी आया था। करीबन 4 घण्टे शारदा के घर हंसी मजाक करने के बाद दोनों लौट गए।
शारदा ने बताया कि उसने अगले दिन दिनेश से आने के लिए आग्रह किया था लेकिन वह फिर कभी नहीं आया!!
पुलिस ने अंधेरे में तीर फेंका और एक बार फिर रमेश से सख्ती से पूछताछ की, "शारदा दिनेश को पसन्द करने लगी तो तूने उसे मार डाला। पुलिस की सख्ती के आगे रमेश टूट गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया!!
उसने बताना शुरू किया कि दो साल पहले उसकी पत्नी का देहान्त हो गया था। दो-तीन महीने के बाद ही शारदा से उसकी बातचीत शुरू हो गई। वह उसके घर जाने लगा। धीरे-धीरे वह खाली वक्त शारदा के यहाँ बिताने लगा, उसके घरेलू खर्चों की पूर्ति करने लगा। सब कुछ अच्छा चल रहा था एक दिन दिनेश को मैं अपने साथ ले गया। दिनेश पैसे के बल पर और अपनी लच्छे दार बातों से शारदा को लुभाने लगा। शारदा भी उसपर आसक्त हो रही थी।
मैंने दिनेश को बहुत समझाया कि तेरी पत्नी है, अपनी पत्नी को देख, शारदा से दूर रह लेकिन वह नहीं माना। उस दिन हम दोनों अपने-अपने रास्ते मुड़ गए थे।
करीबन आधे घण्टे बाद मैं शारदा से मिलने गया तो हैरान रह गया क्योंकि दिनेश वहाँ पहले से मौजूद था, मुझे बहुत बुरा लगा मैंने शारदा से बातों ही बातों में कहा कि दिनेश तुम्हारे पास आ रहा है तो मैं आना बन्द कर देता हूँ। शारदा ने मेरी बात को हंसकर नजरंदाज कर दिया!!
मैं अंदर ही अंदर स्वयं को बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। मैंने बहुत कोशिश की कि दिनेश शारदा के घर से चला जाए लेकिन वह खड़ा नहीं हुआ। हम दोनों एक साथ शारदा के घर से निकले।
रास्ते में मेरी दिनेश के साथ कहासुनी होने लगी मैंने उससे कहा, "तू शारदा के घर नहीं जाएगा!!"
उसने कहा, "शारदा मुझे चाहती है मैं जरूर जाऊंगा।। तुझे शारदा के घर नहीं जाना चाहिए!!"
इतना सुनते ही मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैंने दिनेश को जोर का धक्का दे दिया, वह दीवार से टकराया और उसका सिर फूट गया। खून की धार बह निकली वह बेहोश हो गया। मैंने घसीट कर पानी और दलदल से भरे गड्डे में पटक दिया। वह थोड़ी देर छटपटाया और दलदल में धंसता चला गया।
उसके बाद मैंने शारदा से कई बार कहा कि हम शादी करलें लेकिन वह हंसकर टाल देती इसी तरह चार महीने बीत गए। एक दिन मैं शारदा के घर गया तो उसने मुझे अंदर नहीं आने दिया कहा, "बाद में आना।"
मैंने कहा, "थोड़ी देर बाद चला जाऊंगा।"
लेकिन वह नहीं मानी। दरवाजा बंद करके अंदर चली गई। मैं थोड़ी देर किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा रह गया। उसके बाद खिड़की की झिरी में से झांकने लगा। अंदर का नजारा देखकर मैं आपे से बाहर हो गया और फिर से दरवाजा खटखटा दिया। शारदा ने दरवाजा खोला मैं दनदनाता हुआ अंदर घुस गया और अंदर बैठे व्यक्ति से भिड़ गया। उसके साथ शारदा भी शामिल हो गई। दोनों ने मुझे धक्का देकर घर से बाहर धकेल दिया, कभी न आने की धमकी दी।
उसके बाद मैंने शारदा के घर कभी कदम नहीं रखा। मुझे अपने किए पर बहुत पछतावा है उस दिन के बाद मैं चैन की नींद नहीं सो पाया। जिसके लिए ये गुनाह किया उसने भी मुझे धोखा दे दिया!! इतना कहकर रमेश चंद्र हताश सा जमीन पर बैठ गया!!
पुलिस ने कहा, "अब बाकी का पछतावा जेल में करना!!"
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)
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