अरुंधति ने विश्वकल्याण हेतु तीन वर मांगे।
1. संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी बाल्यकाल तक काम वासना से मुक्त रहे।
बालक और कन्याओं पर कामदेव का कोई वश न चले!!
2. मैं अपने पति वशिष्ठ के अलावा किसी भी पुरुष को कामवासना से ना देख सकूं और यदि कोई परपुरुष मेरी ओर कुदृष्टि से देखे तो सदा के लिए कामवासना से रहित हो जाए!!
3. मैं अखंड सौभाग्यवती रहूं और मेरा पातिव्रत्य धर्म अखंड रहे!!
भगवान विष्णू ने कहा, तथास्तु!
माता अरुंधति की इच्छा पूर्ण हुई!!
माता अरुंधति द्वारा भगवान विष्णु से माँगे गए तीनों वरदान का महत्व जान कर अंतस में कौंधने वाला एक विचार बार-बार व्यग्र करने लगा कि माता अरुंधति जगत माता, श्रद्धेय एवं पूजनीय थीं जिन्होंने भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनाने में महत्पूर्ण योगदान दिया। जगत कल्याण में सहभागी बनी। ऋषि विश्वामित्र ने द्वेष वश उनके 100 पुत्रों की राक्षसों द्वारा हत्या करा दी। अरुंधति ने उन्हें क्षमा कर ब्रह्मज्ञान दे दिया और राक्षसों को भी क्षमा कर दिया।
राम को गले लगा कर वात्सल्य से अभिभूत हो गईं। जगत कल्याण में सहायक बनी राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम बना दिया।
उन्ही अरुंधति माँ ने विष्णु से तीन वर मांगे मात्र स्वयं के लिए, जगत कल्याण को बिसार दिया।
पिछले जन्म में वह ऋषि वशिष्ठ की शिष्या थीं।
ऋषि के तेज और दिव्यता से प्रभावित वह काम के वशीभूत हो ऋषि की पत्नी बनने की कामना करने लगीं। ऋषि की पत्नी बनने की इच्छा तीव्र होती गई। परन्तु गुरु-शिष्य धर्म में ये अपरिहार्य है।
धर्म गुरु-शिष्य के विवाह की अनुमति नहीं देता।
अंततः उन्होंने कठोर तप किया और भगवान विष्णु से वर मांगा। चूंकि वह बाल्यावस्था में कामवासना से वशीभूत हो ऋषि वशिष्ठ से प्रभावित हुई थीं इसलिए उन्होंने प्रथम वर यही मांगा कि बालक और कन्याओं पर कामदेव का वश न चले, जो कि जगत कल्याण में सहायक हुआ। आज भी छोटे बच्चों और कन्याओं पर कामदेव का वश नहीं चलता, वे कामवासना से दूर रहते हैं।
चूंकि वह ऋषि वशिष्ठ पर इस भांति मुग्ध थीं कि द्वितीय वर मांगते समय जगत को विस्मृत कर गईं और स्वयं का सुख सर्वोपरि रखा। मात्र अपने लिए वर मांगा कि "मैं अपने पति वशिष्ठ के अलावा किसी भी पुरुष को कामवासना से ना देख सकूं और यदि कोई परपुरुष मेरी ओर कुदृष्टि से देखे तो सदा के लिए कामवासना से रहित हो जाए!!"
काश उन्होंने ये वरदान सम्पूर्ण नारी जाति एवं पुरुष वर्ग के लिए मांगा होता तो कोई भी महिला, कन्या शोषण, जबरदस्ती व बलात्कार का शिकार न होती। पुरुष भी कन्याओं के प्रति कलुषित विचार व कुदृष्टि न ला पाते।
तृतीय वर अखंड सौभाग्यवती होना एवं पातिव्रत्य धर्म अखंड बना रहे ये भी उन्होंने मात्र स्वयं के लिए मांगा!!
इस वरदान को भी वह सम्पूर्ण नारी जगत के लिए
मांग सकती थी। अगर ऐसा होता तो यह वरदान अकाल मृत्यु रोकने में बहुत बड़ा सहायक बनता।
किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया!!
जब देवी-देवता ही स्वार्थ से परे नहीं हैं तो मानव की क्या बिसात।
देव, मुनि, ऋषि, मनुष्य एवं ईश्वरीय शक्ति को तो दोष दिया ही नहीं जा सकता क्योंकि वे तो वरदानी हैं। वरदान देते हैं उन्हें किसी से वरदान पाने की आवश्यकता नहीं है। वह किसी देवी या नारी पर मोहित होते हैं तो उसे पाने के लिए या विवाह करने के लिए तपस्या करने की जरुरत नहीं है, वह उसे बलात् पा सकते हैं क्योंकि वे बलिष्ठ हैं और मनचाही वस्तु या स्त्री बलात् अधिगत कर लेना उनका जन्म सिद्ध अधिकार है।
इतिहास, ग्रंथ, महाग्रंथ, वेद, पुराण साक्षी हैं कि किसी भी राजा, देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने किसी भी देवी, स्त्री पर मोहित होने के उपरांत उससे विवाह करने के लिए कोई तपस्या नहीं की, कोई वरदान नहीं मांगा। किन्तु लिप्सा अवश्य पूर्ण की, वह भी बलात्।
वही आदर्श जगत के समक्ष प्रस्तुत किए। इंसान उसपर चल रहा है। स्त्री का तो अस्तित्व ही समाप्त कर दिया है। स्त्री मात्र वस्तु, मनोरंजन का साधन और भोग्या बन कर रह गई है। हर कोई आंचल खींचकर चला जाता है।
कोई भी कार्यक्षेत्र हो!! घर, कार्यस्थल, नौकरी में उच्च पद पर आसीन फिर भी अस्मत और आंचल बचाने के लिए 80% महिलाओं को लड़ाई लड़नी पड़ती है।
सिर्फ 10% ही स्त्री वर्ग है जिसे इस दुखदायी एवं कलुषित व्यवस्था से सामना नहीं करना पड़ता।
10% स्त्री वर्ग ऐसा भी है जो परिस्थितयों से समझौता कर आंचल स्वयं ही ढलका देता हैं।
क्या करें काम तो करना ही है।
"पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर" कब तक??
कुछ कर्मठ लोग अपने उसूल पर चलते है।
"कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं, बल्कि कुछ करना पड़ता है।"
इस उसूल पर चलने वाली दिलेर महिलाएं हार नहीं मानतीं, परिस्थितियों से समझौता नहीं करतीं, किन्तु ऐसी स्त्रियाँ ज्यादती और हादसों का शिकार होती रहती हैं क्योंकि पुरुष वर्ग अहम पर चोट बर्दाश्त नहीं कर पाता। उन्हें जड़ से उखाड़ फैंकता है!!
कहीं-कहीं महिला वर्ग भी कलुषित वातावरण बनाने में पीछे नहीं है। वह कामकाजी बनकर बाहरी कार्यक्षेत्र में आ तो जाती हैं। लेकिन कठिन परिश्रम एवं अपने कार्यक्षेत्र में ईमानदार नहीं रह पातीं। कामचोरी एवं दूसरों पर निर्भर रहने की आदत पुरुष वर्ग का मुँह ताकने पर मजबूर करती है।
वह स्वयं को दुर्गम रास्ते पर चलने के लिए तैयार न करके, सुगम मार्ग से पूर्ण करना चाहती हैं। ये मौका परस्त महिलाएँ अपने स्वाभिमान और सम्मान को गिरा कर पुरुष वर्ग का सहारा लेने से कभी नहीं चूकती, अपने कार्यक्षेत्र और परिचित स्थान पर बदनाम होती हैं। कलुषित प्रवृत्ति का पुरुष ऐसी महिलाओं के लिए कतार में रहता है और उसका फायदा उठाने का प्रयास करता है। ऐसी महिलाएँ, सच्चरित्र महिलाओं के रास्ते दुर्गम बनाती हैं, छवि बिगाड़ती हैं, जो अपनी मंजिल बिना सहारे के अपनी मेहनत और योग्यता के बल पर पूर्ण करना चाहती हैं।
उदाहरणतः किसी महिला की सरकारी नौकरी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालय, पंचायत घर, PHC अस्पताल या ऐसे ही किसी स्थान पर लग जाए तो वह महिला (सभी नहीं) सुदूर क्षेत्र में रोजाना जाने से बचने के लिए जुगाड़ बिठाएगी।
प्रथम प्रयास: रोज ना जाना पड़े, एक दिन जाकर 10 दिन के हस्ताक्षर हो जाएं।
द्वितीय प्रयास: बस पकड़ कर रोज कौन जाए?? कोई पुरुष साथी कर्मचारी अपने साथ अपने वाहन पर बिठा कर ले जाए।
तृतीय प्रयास: ऑफिस में ही किसी तरह प्रतिनियुक्ति मिल जाए, दो-चार घण्टे गुजारो, घर का रास्ता पकड़ लो।
चतुर्थ प्रयास: ऑफिसर को लटके-झटके दिखा कर बिल्कुल ही न जाना पड़े, घर ही हस्ताक्षर करा ले जाए, ये सबसे अच्छा।
बिना हाथ-पैर हिलाए नौकरी और पैसा दोनों। बस ऑफिसर मुट्ठी में। वह रात 12:00 बजे घर में आए या सुबह 4:00 बजे। उसे सब छूट है। उसी की मेहरबानी से ही बिना कार्यक्षेत्र मे दाखिल हुए महीने की पहली तारीख को बैंक खाते में तनख्वाह आएगी। उसी तनख्वाह को अपनी गैरत दांव पर लगा कर, बेगैरत, दल्ला पति के साथ मिलकर डकारेगी और बेटा-बेटी के भविष्य की नींव बेगैरत, स्वाभिमान रहित, खोखला बनाएगी।
"इस हाथ ले उस हाथ दे।"
इस दुनिया का यही उसूल है। अपना स्वार्थ और सुख सर्वोपरि है।
"कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना ही पड़ता है।"
कोई किसी से अपना काम निकलवाना चाहता है तो बदले में कुछ तो करना ही पड़ेगा!!
कहते हैं न "एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है।" पुरुष वर्ग तो वैसे ही महिलाओं के क्षेत्र में पूर्णतया अपनी घुसपैठ बनाए हुए है।
इस्मत चुगताई के अनुसार: "यह मर्द की दुनिया है। मर्द ने बनाई और बिगाड़ी है। औरत एक टुकड़ा है उसकी दुनिया का जिसे उसने अपनी मोहब्बत और नफ़रत के इज़हार का ज़रिया बना रखा है। वह उसे मूड के मुताबिक पूजता भी है और ठुकराता भी है।"
इसी मानसिकता को बढ़ावा ये मौकापरस्त महिलाएँ देती हैं। महिलाओं के विरुद्ध पुरुषों की सहायक बनती हैं!!
क्या कभी ऐसा समय आएगा जब पुरुष की कामुक निगाहें आंचल को भेदती हुई स्त्री की देह नापना बंद कर पाएंगी??
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान)
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