घर में बहुत चहल-पहल थी गोविंद के ताऊ की बेटी की लगुन थी 30 जनवरी 1948 को बारात आनी थी। 5वीं कक्षा में पढ़ने वाला गोविंद बहुत खुश था। घर में महमानों की भीड़ थी। नाच-गाना चल रहा था। मिठाइयाँ बन रही थीं, उसने अपने सब दोस्तों को बुलाया था, सभी मौजमस्ती और दावत उड़ाने में मग्न थे।
11 बजे लगुन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
शादी का दिन भी आया बारात आ गई। घर में तैयारियाँ चल रही थीं लेकिन बाहर सब शान्त था। भारत शोक मना रहा था क्योंकि नाथूराम गौडसे नामक व्यक्ति ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को गोली मार दी थी। सब दुखी थे। शादी की तैयारियाँ फीकी पड़ गईं। बहुत से रिश्तेदार शादी में शामिल नहीं हो पाए। बारात भी आई कुछ गिने-चुने लोग लेकर, बारात की चढ़ाई भी शुरू हुई लेकिन कोई धूम-धड़ाका नहीं, बैंड-बाजा भी साथ चल रहा था लेकिन वह बैंड बज नहीं रहा था, क्योंकि खुशी मनाने पर रोक थी। सिर्फ आवश्यक कार्य सम्पन्न हो रहे थे जिन्हें रोका नहीं जा सकता। शान्ति के माहौल में शादी सम्पन्न हुई और गोविंद की बहन ससुराल विदा हो गई। कुछ दिनों में बात आई-गई हो गई।
गोविंद के पिता दो भाई थे। शिवदयाल जो कि ब्याज पर लेन-देन का कार्य करते थे और सूरजभान सरकार के मुलाजिम (पटवारी) थे।
शिवदयाल के परिवार में एक बेटा दो बेटियाँ थीं और सूरजभान के परिवार में दो बेटे एक बेटी थी।
शिवदयाल की दोनों बेटियों की शादी हो गई। बेटा अविवाहित था। सूरजभान के तीनों बच्चे अविवाहित थे। गोविंद सबसे बड़ा 5वीं कक्षा का छात्र था। उससे छोटा चेतन 4थी कक्षा में पढ़ता था। छोटी बहन शान्ति।
ताऊजी की छोटी बेटी कमला की शादी को चार माह ही बीते थे कि सूरजभान (गोविंद के पिता) का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। सूरजभान के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
पत्नी रामश्री (गोविंद की माँ) निरक्षर और दुनियादारी से दूर, पूर्णतया जेठ शिवदयाल पर निर्भर!!
वैसे भी दोनों भाई इकट्ठे रहते थे।
दोनों की पत्नियाँ बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ। दोनों ही लेन-देन की बातें और रुपए-पैसे के बारे में पत्नियों को नहीं बताते थे। जो भी कुछ था दोनों भाइयों के बीच ही सीमित था।
सूरजभान की मौत को एक साल भी नहीं बीता था कि शिवदयाल ने चुपके से जमीन-जायदाद बेच दी और सारी धन-सम्पत्ति समेटकर अपने बेटे और पत्नी के साथ नासिक भाग गए।
सूरजभान का परिवार बेघर और बेसहारा हो गया।
सूरजभान की पत्नी रामश्री को परिवार सहित अपने भाई चन्द्रशेखर के यहाँ शरण लेनी पड़ी। इस आवा-जाही में दो वर्ष बीत गए।
रामश्री ने समझदारी से काम लेते हुए जो भी थोड़े-बहुत जेवर थे उन्हें बेचकर, घर के बर्तनों से रस्में पूरी करते हुए 9 वर्षीय बेटी शान्ति का विवाह सम्पन्न कर दिया।
चन्द्रशेखर के प्रयास से 7वीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही गोविंद को लिपिक के पद पर सरकारी नौकरी मिल गई। घर के हालात सुधरने लगे। रामश्री भाई का घर छोड़कर किराए के मकान में रहने लगीं।
नासिक जाकर शिवदयाल ने व्यवसाय प्रारंभ किया और अपनी जीविका चलाने लगे। कुछ दिनों में अपने बेटे का विवाह कर लिया। रामश्री को भी बेटे के विवाह का न्योता भेजा गया किन्तु रामश्री ने विवाह में जाना उचित न समझा। बेटे की पत्नी सुन्दरता के साथ-साथ बहुत तेज-तर्रार थी। वह सास-ससुर की बेइज्जती का कोई भी मौका नहीं छोड़ती।
दो साल बाद ही गोविंद की शादी हो गई। एक साल बाद बेटी पैदा हुई। दूसरी बार बेटा पैदा हुआ किन्तु गर्भावस्था के दौरान कुछ नाजुक स्थिति होने के कारण पत्नी ने दम तोड़ दिया। दोनों बच्चे बिन माँ के हो गए।
एक वर्ष तक दादी (रामश्री) ने बच्चों की देखभाल की। उसके बाद उन्हें भी दिल का दौरा पड़ा और दुनिया से चली गईं।
एक-डेढ़ साल बाद गोविंद का दूसरा विवाह हो गया। सुघड़ पत्नी आ गई उसने सब कुछ संभाल लिया!!
उधर नासिक में शिवदयाल की भी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के पश्चात बहू सुमन ने सास के साथ मारपीट की उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। 24 घण्टे तक वह घर के बाहर भूखी-प्यासी बैठी रोती रही।
इस बीच बेटा मां को अंदर लाने के लिए पत्नी से मिन्नतें करता रहा, जब वह किसी भी तरह नहीं मानी तो बेटा मां को गोविंद के घर छोड़ गया। गोविंद के ताऊ शिवदयाल की पत्नी मरते दम तक गोविंद के साथ रही। गोविंद की पत्नी ने उन्हें पूरी उम्र सम्मान के साथ रखा।
जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके बेटे-बहू को सूचित किया गया। उनकी बहू ने आने से इन्कार कर दिया, चार दिन बाद बेटा आया, तब तक गोविंद अपनी ताई का पूरे सम्मान के साथ दाह-संस्कार कर चुका था। शिवदयाल का बेटा अपनी लाचारी पर बहुत शर्मिन्दा था!! गोविंद की वाह-वाही का चर्चा सबकी जबान पर था!!
स्वरचित-सरिता श्रीवास्तव "श्री"
धौलपुर (राजस्थान )
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